
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। भारतीय सनातन परंपरा में महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं,बल्कि आत्म जागरण का दिव्य अवसर है। यह वह रात्रि है जब अज्ञान का अंधकार हटाकर चेतना का दीप प्रज्वलित करने का संदेश दिया जाता है। 15 फरवरी को आने वाली यह पावन रात्रि प्रकृति और पुरुष,शक्ति और शिव, चेतना और शून्य के दिव्य मिलन का प्रतीक है। देवभूमि उत्तराखंड की पवित्र वादियों में बसे शिवालयों से लेकर देश-विदेश के ज्योतिर्लिंगों तक,इस दिन श्रद्धा,साधना और समर्पण की अद्भुत छटा देखने को मिलती है। शिव का अर्थ है-कल्याण,मंगल और शुभता। रात्रि का अर्थ है-विश्राम,शांति और अंतर्मुखता। महाशिवरात्रि वह कालखंड है जब जीवात्मा परमात्मा में लीन होने का प्रयास करती है। शिवपुराण के अनुसार इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह संपन्न हुआ था। यह प्रसंग केवल पौराणिक घटना नहीं,बल्कि एक गहन दार्शनिक संदेश है-शक्ति के बिना शिव शव हैं और शिव के बिना शक्ति अधूरी। अर्थात् सृजन और संहार,ऊर्जा और चेतना-दोनों का संतुलन ही जीवन का सार है। जागरण केवल रात भर जागना नहीं चेतना का उदय
महाशिवरात्रि का जागरण बाहरी अनुष्ठान भर नहीं है। यह अपने भीतर की निद्रा को तोड़ने का आह्वान है। जब बाहरी कोलाहल शांत होता है,तभी अंतरात्मा की आवाज सुनाई देती है। मौन में ही महाकाल का साक्षात्कार संभव है। भगवान शिव हिमालय की कंदराओं में तपस्वी भी हैं और कैलाश पर परिवार सहित विराजमान आदर्श गृहस्थ भी। वे यह संदेश देते हैं कि संसार में रहते हुए भी उससे आसक्त न होना ही सच्चा योग है। आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में शिव का यह संतुलन मनुष्य को सिखाता है। नीलकंठ का संदेश-विषपान और करुणा समुद्र मंथन के दौरान जब हलाहल विष निकला,तब संपूर्ण सृष्टि संकट में पड़ गई। भगवान शिव ने उस विष को कंठ में धारण कर नीलकंठ कहलाए। यह प्रसंग हमें सिखाता है-समाज की बुराइयों को फैलने देने के बजाय धैर्य,संयम और करुणा से उन्हें रोकना ही सच्ची मानवता है। खगोलीय दृष्टि से महाशिवरात्रि की रात्रि विशेष मानी जाती है। मान्यता है कि इस दिन पृथ्वी की स्थिति ऐसी होती है कि मनुष्य की आंतरिक ऊर्जा स्वाभाविक रूप से ऊपर की ओर प्रवाहित होती है। इसी कारण साधकों को रीढ़ सीधी रखकर ध्यान में बैठने का महत्व बताया गया है,जिससे ऊर्जा का ऊर्ध्वगामी प्रवाह आध्यात्मिक उन्नति में सहायक बन सके। उपवास केवल अन्न त्याग नहीं,बल्कि इंद्रियों पर संयम का अभ्यास है। अभिषेक केवल जल या दूध चढ़ाना नहीं बल्कि अपने अहंकार का समर्पण है। जब हम ॐ नमः शिवाय का जाप करते हैं, तो वास्तव में हम अपने भीतर के सत्यं शिवम सुंदरम् को जागृत करते हैं। इस 15 फरवरी को जब मंदिरों में घंटानाद गूंजे,जब शिवालयों में जलाभिषेक हो,तब केवल बाहरी पूजा तक सीमित न रहें। एक क्षण ठहरें अपने भीतर झांकें क्योंकि आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं। (हे शिव! मेरी आत्मा आप हैं, मेरी बुद्धि पार्वती है और मेरा शरीर आपका मंदिर है।) महाशिवरात्रि हमें यही स्मरण कराती है कि शिव कोई दूरस्थ सत्ता नहीं,बल्कि हमारे भीतर की चेतना हैं। आइए इस महापर्व पर हम अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ें और अपने जीवन में शिवत्व का साक्षात्कार करें। लेखक-डॉ.अखिलेश चन्द्र चमोला