
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। भारतीय शिक्षा को उसकी जड़ों से जोड़ने और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में समृद्ध बनाने की दिशा में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय में आयोजित छह दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान परम्परा का एकीकरण का पांचवां दिन बौद्धिक गहराई और सार्थक संवाद का साक्षी बना। विश्वविद्यालय के शैक्षणिक क्रियाकलाप केंद्र में मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र (एमएमटीटीसी) के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में भारतीय ज्ञान परम्परा के विविध आयामों अर्थशास्त्र,योग,लोकवार्ता और पंचतंत्र पर विशेषज्ञों ने गंभीर एवं समकालीन दृष्टि से विचार रखे। प्राचीन अर्थशास्त्र से समकालीन विकास तक देहरादून स्थित जिज्ञासा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अजय जोशी ने अपने व्याख्यान में प्राचीन भारतीय अर्थशास्त्र की अवधारणा को विस्तार से स्पष्ट किया। उन्होंने कौटिल्य के अर्थशास्त्र,राज्य-व्यवस्था,नैतिक शासन और लोककल्याण की अवधारणा को वर्तमान समय से जोड़ते हुए कहा कि भारतीय अर्थदर्शन केवल आर्थिक समृद्धि का नहीं,बल्कि संतुलित और न्यायपूर्ण विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। उन्होंने रेखांकित किया कि आज जब वैश्विक अर्थव्यवस्था चुनौतियों से जूझ रही है,तब भारतीय चिंतन में निहित समन्वय और नैतिकता की अवधारणा अत्यंत प्रासंगिक हो उठती है। एसवीएम बीएड कॉलेज की डॉ.पूनम थपलियाल ने पंचतंत्र की शिक्षाप्रद कथाओं और भारतीय लोकवार्ता की परंपरा पर व्याख्यान देते हुए कहा कि लोक साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं,बल्कि व्यवहारिक बुद्धिमत्ता और नैतिक मूल्यों का जीवंत स्रोत है। उन्होंने कहा कि पंचतंत्र की कहानियां नीति,संवाद-कौशल,नेतृत्व क्षमता और सामाजिक समरसता का व्यावहारिक पाठ पढ़ाती हैं। यदि इन्हें आधुनिक शिक्षण पद्धति में समाहित किया जाए तो विद्यार्थियों में नैतिक चेतना और व्यावहारिक दृष्टिकोण का विकास संभव है। कार्यक्रम के अंतिम सत्र में प्रो.प्रशांत कंडारी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और भारतीय ज्ञान प्रणाली के समन्वय पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय ज्ञान परम्परा को मुख्यधारा में लाने का दूरदर्शी प्रयास है,जो शिक्षा को भारतीय मूल्यों और वैश्विक दृष्टिकोण के साथ संतुलित करने का मार्ग प्रशस्त करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगारपरकता नहीं,बल्कि सांस्कृतिक चेतना और मानवीय मूल्यों का संवर्धन भी होना चाहिए। आयोजकों के अनुसार कार्यक्रम के अंतिम दिवस पर दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रख्यात ज्योतिषाचार्य प्रो.पवन सिन्हा का विशेष व्याख्यान प्रस्तावित है,जिसमें भारतीय ज्ञान परम्परा के दार्शनिक एवं ज्योतिषीय आयामों को समकालीन संदर्भ में समझने का अवसर मिलेगा। कार्यक्रम में विभिन्न महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों एवं प्रतिभागियों की सक्रिय भागीदारी रही। यूजीसी पर्यवेक्षक प्रो.आर.एल.नारायण सिम्हा,निदेशक प्रो.डी.एस.नेगी,कार्यक्रम समन्वयक डॉ.अमरजीत परिहार,डॉ.पुनीत वालिया सहित अनेक शिक्षाविद उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ.नरेंद्र चौहान एवं शोधार्थी शिवानी ने प्रभावी ढंग से किया। भारतीय ज्ञान परम्परा के बहुआयामी स्वरूप पर हुआ यह विमर्श केवल अकादमिक चर्चा नहीं,बल्कि शिक्षा को भारतीयता की जड़ों से जोड़ने की दिशा में एक सशक्त पहल सिद्ध हुआ।