हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। चारधाम यात्रा के मुख्य पड़ाव श्रीनगर में पानी की व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यात्रा सीजन नजदीक आते ही शहर में बढ़ती पानी की मांग और मौजूदा अव्यवस्थाओं ने आम जनता और व्यापारियों दोनों की चिंता बढ़ा दी है। इसी मुद्दे को लेकर आरटीई/आईटीआई कार्यकर्ता कुशलानाथ ने जल निगम के अधिशासी अभियंता से मुलाकात कर एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा,जिसमें शहर की पेयजल व्यवस्था से जुड़े कई अहम मुद्दे उठाए गए। ज्ञापन में साफ तौर पर कहा गया है कि श्रीनगर चारधाम यात्रा का प्रमुख पड़ाव होने के कारण यहां हर साल हजारों श्रद्धालु ठहरते हैं। इस दौरान होटल,रेस्टोरेंट और गेस्ट हाउसों में पानी की खपत कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे में इन व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को अतिरिक्त पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करना बेहद जरूरी हो जाता है। आम जनता पर संकट एक ओर जहां होटलों के लिए अतिरिक्त पानी की मांग उठ रही है,वहीं दूसरी ओर शहर के मोहल्लों और बाजारों में रहने वाले आम उपभोक्ताओं को पहले से ही कम दबाव और अनियमित आपूर्ति की समस्या झेलनी पड़ रही है। कई क्षेत्रों में लोगों को जरूरत भर पानी तक नहीं मिल पा रहा,जिससे रोजमर्रा का जीवन प्रभावित हो रहा है। गंदे पानी की शिकायतें
स्थिति और भी चिंताजनक तब हो जाती है जब कुछ मोहल्लों से गंदे और दूषित पानी की सप्लाई की शिकायतें सामने आती हैं। यह न केवल स्वास्थ्य के लिए खतरा है,बल्कि विभागीय लापरवाही को भी उजागर करता है। ज्ञापन में मांग की गई है कि ऐसे क्षेत्रों में पानी के नमूनों की जांच कर शुद्ध पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए। जल संस्थान और जल निगम की लापरवाही से शहर में कई स्थानों पर पाइपलाइन लीकेज की समस्या बनी हुई है। इससे न सिर्फ पानी की बर्बादी हो रही है,बल्कि सप्लाई भी प्रभावित हो रही है। ज्ञापन में पूरे शहर में पाइपलाइन का सर्वे कर लीकेज को तत्काल ठीक कराने की मांग की गई है। कार्रवाई की मांग कुशलानाथ ने सहायक अधिशासी अभियंता से मांग की है कि इन सभी बिंदुओं पर गंभीरता से संज्ञान लेते हुए शीघ्र कार्रवाई की जाए,ताकि चारधाम यात्रा के दौरान होटल व्यवसाय के साथ-साथ आम जनता को भी शुद्ध और नियमित पानी मिल सके। चारधाम यात्रा जैसे बड़े धार्मिक आयोजन से पहले क्या प्रशासन पानी की इस चुनौती से निपटने के लिए तैयार है या फिर हर साल की तरह इस बार भी आम जनता को ही इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। अब निगाहें प्रशासन पर हैं-क्या श्रीनगर में पानी की राजनीति खत्म होगी या प्यासे रहेंगे लोग।