
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। श्रीनगर के गांव की बात रेडियो कार्यक्रम ने इस बार पहाड़ की जमीनी सच्चाइयों को आवाज देने का काम किया,जहां नैथाणा और आसपास के गांवों से आई महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भागीदारी करते हुए पहाड़ के अस्तित्व से जुड़े गंभीर मुद्दों पर खुलकर चर्चा की। कार्यक्रम में पलायन की मार से सूने होते गांव,बंजर होती खेती,दावानल से झुलसते जंगल और बदलती सामाजिक संरचना जैसे विषय केंद्र में रहे। सीरणी बागवान की काश्तकार चंद्रकला बंगवाल ने बेबाकी से कहा कि उत्तराखंड राज्य बनने के बाद जिस तेजी से गांव खाली हुए हैं,वह अत्यंत चिंताजनक है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर क्यों विकास की धारा पहाड़ तक नहीं पहुंच पाई। उनके अनुसार नीतिगत स्तर पर पहाड़ों के प्रति उपेक्षापूर्ण सोच इसका बड़ा कारण रही है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि जो भी नेता,अधिकारी या जनप्रतिनिधि बने उन्होंने सबसे पहले पहाड़ से दूरी बना ली-नतीजा यह है कि आज गांवों में केवल बुजुर्गों के सहारे ही जीवन की लौ टिमटिमा रही है। इसी कड़ी में अंजना घिल्डियाल ने स्वरोजगार की एक सकारात्मक मिसाल पेश की। उन्होंने बताया कि वे अचार,मुरब्बा और विशेष रूप से अदरक की कैंडी बनाकर न सिर्फ आत्मनिर्भर बनी हैं,बल्कि समाज में भी बदलाव ला रही हैं। उनका कहना है कि उनकी बनाई अदरक कैंडी गुटखा और तंबाकू छोड़ने वालों के लिए एक विकल्प बन रही है,जिससे स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता भी बढ़ रही है। स्वीत गांव से रेखा देवी के नेतृत्व में आई महिलाओं ने पारंपरिक आजीविका खेती और पशुपालन को आज भी मजबूती से थामे रखने की बात कही। उन्होंने बताया कि दूध उत्पादन के जरिए वे अपनी आजीविका चला रही हैं और साथ ही खेलकूद में भी सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं। इसका सकारात्मक असर नई पीढ़ी पर भी दिख रहा है,जहां बच्चे मोबाइल की दुनिया से निकलकर खेल के मैदानों में लौट रहे हैं। वरिष्ठ रंगकर्मी बिमल प्रसाद बहुगुणा ने अपने संदेश में स्पष्ट कहा कि यदि पहाड़ों को जीवंत रखना है तो अपनी संस्कृति,बोली,भाषा और संस्कारों को जीवित रखना अनिवार्य है। उन्होंने इसे पहाड़ की असली पहचान बताया। कार्यक्रम में नैथाणा से अमृता बहुगुणा और सीमा देवी के नेतृत्व में आई टीम ने भी सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर अपने विचार साझा किए। वहीं माध्यमिक वर्ग बालिका एवं महिला क्रिकेट के संस्थापक देवेंद्र गौड़ ने पहाड़ की वर्तमान स्थिति को बेहद चिंताजनक बताते हुए कहा कि तेजी से हो रहा पलायन पहाड़ की जड़ों को कमजोर कर रहा है। उन्होंने बाहरी लोगों द्वारा सस्ते दामों पर जमीन खरीदने के बढ़ते चलन पर भी चिंता जताई। देवेंद्र गौड़ ने शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि सरकारी विद्यालयों के बंद होने के पीछे केवल सरकार ही नहीं,बल्कि समाज की सोच भी जिम्मेदार है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि सरकारी सेवाओं में कार्यरत लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाएं,तो शिक्षा की गुणवत्ता में स्वतः सुधार आएगा और पहाड़ों में शिक्षा का ढांचा मजबूत होगा। इस रेडियो संवाद में ममता,सुनीता,रुचि,रजनी,ऊषा,आनंदी,शकुंतला,मीनाक्षी देवी,रजनी जुगराण,अमृता बहुगुणा,सीमा कपर्वाण सहित बड़ी संख्या में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी रही। कार्यक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि पहाड़ की महिलाएं अब केवल समस्याओं की श्रोता नहीं,बल्कि समाधान की सक्रिय भागीदार बन रही हैं। यह संवाद न केवल पहाड़ के दर्द को बयां करता है,बल्कि यह भी संकेत देता है कि यदि स्थानीय स्तर पर जागरूकता और सहभागिता बनी रही,तो पहाड़ का भविष्य अभी भी सुरक्षित किया जा सकता है।