
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल/उत्तराखण्ड।
देवभूमि उत्तराखण्ड की पवित्र वादियों में प्रकृति ने जहां हरियाली,जल और जैव विविधता का अद्भुत खजाना दिया है,वहीं यहां की धरती पर ऐसे अनेक पारंपरिक वनस्पति खजाने भी मौजूद हैं,जो न केवल पहाड़ के स्वाद को जीवित रखते हैं,बल्कि स्वास्थ्य और संस्कृति के संवाहक भी हैं। इन्हीं में से एक है स्थानीय रूप से गिवीराल के नाम से प्रसिद्ध पेड़,जो आज भी ग्रामीण जीवन की थाली,परंपरा और लोकज्ञान का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है। कोपल में छुपा स्वाद,परंपरा की पहचान जब बसंत ऋतु में पहाड़ों की ढलानों पर गिवीराल के पेड़ में नई-नई कोमल कोपलें फूटती हैं,तो यह केवल एक प्राकृतिक परिवर्तन नहीं होता,बल्कि गांवों में खुशियों का संकेत बन जाता है। गांव की महिलाएं और बुजुर्ग बड़े स्नेह के साथ इन कोपलों को एकत्रित करते हैं-इनसे बनती है विशेष पहाड़ी सब्जी,जिसमें अद्भुत स्वाद होता है,साथ ही बनाया जाता है-पारंपरिक अचार,जो लंबे समय तक भोजन का स्वाद बढ़ाता है यह स्वाद केवल जीभ तक सीमित नहीं रहता,बल्कि बचपन की यादों,परिवार के साथ बिताए पलों और गांव की मिट्टी की खुशबू को भी जीवित कर देता है। फूलों से थाली तक-ठंडक और ताजगी का एहसास गिवीराल के फूल जब खिलते हैं,दही के साथ तैयार यह रायता-शरीर को ठंडक देता है। गर्मियों में संतुलन बनाए रखता है। वरिष्ठ कृषि विशेषज्ञों और आयुर्वेदाचार्यों की राय कृषि विशेषज्ञों और पारंपरिक ज्ञान रखने वाले बुजुर्गों के अनुसार गिवीराल केवल स्वाद तक सीमित नहीं है,बल्कि यह स्वास्थ्य का भी खजाना है। पाचन शक्ति का प्राकृतिक सहायक-इसकी कोपल में मौजूद प्राकृतिक कड़वे तत्व पाचन क्रिया को मजबूत बनाते हैं और अपच,गैस जैसी समस्याओं में राहत देते हैं। रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि-गिवीराल में पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट शरीर की इम्युनिटी को बढ़ाते हैं और मौसमी बीमारियों से बचाव करते हैं। रक्त शुद्धिकरण में सहायक आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार यह शरीर के विषैले तत्वों को बाहर निकालने में मदद करता है और त्वचा को स्वस्थ बनाए रखता है। हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी-नियमित और संतुलित मात्रा में सेवन करने से यह हृदय को स्वस्थ रखने में सहायक माना जाता है। प्राकृतिक शीतलता प्रदान करने वाला-फूल से बना रायता शरीर को अंदर से ठंडा रखता है और गर्मी के प्रभाव को कम करता है। गिवीराल केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं,बल्कि पहाड़ की जीवनशैली और संस्कृति का प्रतीक है। जब गांवों में इसकी कोपलें तोड़ी जाती हैं,तो यह एक सामाजिक परंपरा बन जाती है-महिलाएं समूह में जंगल जाती हैं हंसी-मजाक और लोकगीतों के बीच यह कार्य होता है और फिर घरों में वही कोपल स्वादिष्ट व्यंजन का रूप ले लेती है। वरिष्ठ साहित्यकारों के अनुसार गिवीराल पहाड़ की उस आत्मा का प्रतीक है,जो प्रकृति और मानव के बीच संतुलन बनाए रखती है। आज के बदलते दौर में जहां पारंपरिक खाद्य पदार्थ धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं,वहीं गिवीराल जैसे पेड़ों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है-इसका सेवन सीमित मात्रा में ही करें,सही पहचान के बाद ही उपयोग करें,पारंपरिक विधियों से ही पकाए,परंपरा को बचाना,भविष्य को संवारना गिवीराल केवल एक पेड़ नहीं,बल्कि उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक विरासत,लोकज्ञान और प्राकृतिक चिकित्सा का जीवंत उदाहरण है। आज जरूरत है कि नई पीढ़ी इस अनमोल धरोहर को पहचाने,अपनाए और संरक्षित करे, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस स्वाद,इस संस्कृति और इस प्रकृति से जुड़ी रह सकें। देवभूमि का यह उपहार हमें यह सिखाता है कि असली समृद्धि प्रकृति के साथ जुड़ाव में ही छुपी है।