
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी के भव्य साहित्योत्सव-2026 में उत्तराखंड की धरती से एक बार फिर साहित्यिक प्रतिभा ने अपनी चमक बिखेरी है। प्रो.मंजुला राणा को उनकी चर्चित कहानी डॉलर के लिए हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कहानी के सम्मान से नवाजा गया है। यह उपलब्धि न केवल उनके व्यक्तिगत साहित्यिक सफर की बड़ी पहचान है,बल्कि पूरे गढ़वाल और उत्तराखंड के लिए गर्व का क्षण भी है। नई दिल्ली स्थित रवींद्र भवन में 30 मार्च से 4 अप्रैल 2026 तक आयोजित इस भव्य साहित्यिक महाकुंभ में देशभर के नामचीन साहित्यकारों ने अपनी रचनात्मक उपस्थिति दर्ज कराई। हिंदी कहानी वाचन सत्र में जब प्रो.मंजुला राणा ने डॉलर का पाठ किया,तो श्रोतागण उसकी संवेदनशीलता और यथार्थ के सशक्त चित्रण से भाव-विभोर हो उठे। यह कहानी केवल एक आर्थिक प्रतीक डॉलर तक सीमित नहीं है,बल्कि इसके माध्यम से आधुनिक समाज में बदलते रिश्तों,प्रवासी जीवन की विडंबनाओं और पारिवारिक मूल्यों के क्षरण को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। यही कारण रहा कि यह कहानी साहित्य के मर्मज्ञों के बीच विशेष चर्चा का केंद्र बनी और अंततः सर्वश्रेष्ठ कहानी के सम्मान से अलंकृत हुई। इस विशेष सत्र का संचालन पद्म भूषण एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित सुप्रसिद्ध लेखिका डॉ.प्रतिभा राय की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ,जिसने कार्यक्रम की गरिमा को और ऊंचाई प्रदान की। अपने सम्मान पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रो.मंजुला राणा ने भावुक स्वर में कहा कि यह उनके लिए अत्यंत सौभाग्य और गर्व का क्षण है। उन्होंने इसे अपने पाठकों,साहित्य प्रेमियों और अपनी मातृभूमि को समर्पित किया। साथ ही उन्होंने बताया कि इस वर्ष के साहित्योत्सव में 100 से अधिक सत्रों में 650 से अधिक साहित्यकारों,कवियों और विद्वानों ने भाग लिया,जिसमें देश की 50 से अधिक भाषाओं का प्रतिनिधित्व हुआ। गौरतलब है कि प्रो.मंजुला राणा लंबे समय से हिंदी कथा-साहित्य में सक्रिय रही हैं और हेमवती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएं दे रही हैं। इसके साथ ही वे उत्तराखंड लोक सेवा आयोग की सदस्य के रूप में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा चुकी हैं। उनकी यह उपलब्धि न केवल उनके रचनात्मक कौशल का प्रमाण है,बल्कि यह भी दर्शाती है कि गढ़वाल की मिट्टी में आज भी साहित्य की गहरी संवेदनाएं और सृजनशीलता जीवित है। डॉलर की सफलता ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि सशक्त लेखनी सीमाओं की मोहताज नहीं होती-वह सीधे दिलों तक पहुंचती है और समाज को सोचने पर मजबूर कर देती है।