हिमालय पृथ्वी की सबसे युवा और भूगर्भीय रूप से अस्थिर पर्वत श्रृंखला है। इसकी खड़ी ढलानें, भूकंपीय गतिविधियां और ग्लेशियरों की उपस्थिति इसे प्राकृतिक आपदाओं के लिए अत्यधिक संवेदनशील बनाती हैं।
उत्तरकाशी के धराली में 5 अगस्त 2025 को बादल फटने और त्वरित बाढ़ ने भारी तबाही मचाई। कई घर, दुकानें और वाहन मलबे में दब गए। आपदा प्रबंधन टीमें अभी भी फंसे हुए लोगों की तलाश कर रही हैं। इसी बीच, चमोली के थराली में भी 22-23 अगस्त की रात को बादल फटने से पिंडर और प्रणमति नदियां उफान पर आ गईं। कई वाहन बहे और दो लोगों के लापता होने की खबर है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की सैटेलाइट रिपोर्ट के अनुसार, धराली की बाढ़ ने नदी का पुराना मार्ग बदलकर 20 हेक्टेयर क्षेत्र में मलबा जमा कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित मानवीय गतिविधियां आपदाओं को और गंभीर बना रही हैं।
हिमालयी क्षेत्र क्यों संवेदनशील है?
- बादल फटना, भूस्खलन और ग्लेशियर झील फटना यहाँ आम हो चुके हैं।
- 2013 की केदारनाथ त्रासदी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जिसमें 6,000 से अधिक लोग मारे गए थे।
- 2021 में चमोली के रैणी गांव में ग्लेशियर झील टूटने से 200 से ज्यादा लोग लापता हो गए और दो जलविद्युत परियोजनाएं बह गईं।
आपदाओं के कारण:
- अनियोजित निर्माण और बांध परियोजनाएं
- जंगलों की कटाई और मिट्टी की जल धारण क्षमता में कमी
- सड़क और सुरंग निर्माण के लिए पहाड़ों की अंधाधुंध खुदाई
- ग्लोबल वार्मिंग और ग्लेशियर पिघलना\
- स्थानीय लोगों का जनजीवन और अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित
- पर्यटन केंद्र जैसे धराली और हर्षिल को गहरा नुकसान
- हजारों लोग बेघर और विस्थापित
- हिमनद झीलों के लिए विशेष जल निकासी योजना
- पर्यावरणीय दृष्टि से संतुलित विकास कार्य
- स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण
- बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और जल संरक्षण कार्यक्रम
- कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए ठोस नीति
उत्तराखंड का हिमालयी क्षेत्र बार-बार प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में आ रहा है। जलवायु परिवर्तन और मानवीय हस्तक्षेप ने स्थिति को और विकट बना दिया है। सरकार, वैज्ञानिकों और स्थानीय समुदायों को मिलकर कार्य करना होगा ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों को कम किया जा सके और हिमालयी जीवन सुरक्षित रह सके।