उत्तराखंड का स्वाद, स्वास्थ्य और समृद्धि का संगम पारम्परिक भोजन मंडुवा की रोटी और कंडाली की काफली

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत में यहां का पारंपरिक खान-पान भी एक अनमोल धरोहर है। आधुनिकता की दौड़ में भले ही फास्ट फूड और बाजारू भोजन ने

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी श्रीनगर गढ़वाल।

देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत में यहां का पारंपरिक खान-पान भी एक अनमोल धरोहर है। आधुनिकता की दौड़ में भले ही फास्ट फूड और बाजारू भोजन ने लोगों को आकर्षित किया हो,लेकिन आज भी पहाड़ की असली ताकत उसके लोक-पारंपरिक व्यंजनों में ही समाई है। इसी संदेश के साथ एक जन अभियान शुरू हुआ है। उत्तराखंड का पारम्परिक भोजन अपनाएं-मंडुवा की रोटी,कंडाली की काफली। मंडुवा (रागी) की रोटी जहां स्वास्थ्य का खजाना है,वहीं कंडाली की काफली (बिच्छू घास की सब्जी) शरीर को प्राकृतिक औषधीय शक्ति प्रदान करती है। ये व्यंजन न केवल स्वादिष्ट हैं,बल्कि हिमालयी जनजीवन को जोड़ने वाले ऐतिहासिक और पारंपरिक स्वाद भी हैं। क्यों अपनाएं पारंपरिक भोजन-विशेषज्ञों का कहना है कि मंडुवा प्रोटीन,कैल्शियम और फाइबर का बेहतर स्रोत है,जो मधुमेह और मोटापे जैसे रोगों से बचाने में सहायक है। वहीं कंडाली की काफली में आयरन और मिनरल्स भरपूर होते हैं,जो शरीर को रोगमुक्त और ऊर्जा से भरपूर बनाते हैं। यह भोजन ना केवल सेहत के लिए लाभकारी है,बल्कि गांव की आर्थिकी से भी जुड़ा है। सरकार और स्थानीय संगठन भी कर रहे प्रोत्साहित राज्य सरकार के साथ कई स्वयंसेवी संस्थाएं और ग्रामीण महिला समूह मिलकर पारंपरिक भोजन अपनाओ जैसे अभियानों के माध्यम से लोगों को अपने खान-पान की जड़ों से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। हाट-बाजारों और मेलों में मंडुवा-बार्ले की रोटियां,गहत-भट की दालें,कंडाली की काफली और झंगोरे की खीर जैसी पहाड़ी थालियां अब आकर्षण का केंद्र बनने लगी हैं। भविष्य की पीढ़ी के लिए संजोएं विरासत यदि हम आज अपने बच्चों को मंडुवा और कंडाली जैसे पौष्टिक भोजन से परिचित कराएंगे,तो न केवल उनके स्वास्थ्य को मजबूत बनाएंगे,बल्कि उत्तराखंड की पारंपरिक कृषि और जैव विविधता को भी जीवित रख पाएंगे। इसलिए आइए,उत्तराखंड का यह संदेश जन-जन तक पहुंचाएं,परंपरा को अपनाएं,मंडुवा-कंडाली का स्वाद बढ़ाएं और उत्तराखंड को सेहतमंद बनाएं।

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