
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड के अलकनंदा तट पर बसे ऐतिहासिक एवं पौराणिक नगर श्रीनगर में धर्म,आस्था,संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का अनुपम संगम देखने को मिला। नगर के पौराणिक गणेश मंदिर में कूर्म महापुराण कथा का विधिवत शुभारंभ कलश यात्रा के साथ हुआ। प्रथम दिवस आयोजित कलश यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने श्रद्धा एवं उत्साह के साथ प्रतिभाग किया। विशेष रूप से मातृशक्ति की उल्लेखनीय भागीदारी ने पूरे आयोजन को धार्मिक एवं सांस्कृतिक रंग से सराबोर कर दिया। कलश यात्रा के पश्चात विधि-विधान एवं वैदिक मंत्रोच्चार के बीच व्यासपीठ पर विराजमान कथावाचक आचार्य मधुसूदन घिल्डियाल सहित आचार्य एवं विद्वान पंडितजनों ने धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए। इसके बाद श्रद्धालुओं ने कूर्म महापुराण की कथा का श्रवण किया। कथा के प्रथम दिवस भगवान गणेश की आराधना एवं मंगलाचरण के साथ श्रद्धालुओं को धर्म,आस्था,संस्कार और आध्यात्मिक जीवन के महत्व से अवगत कराया गया। कूर्म महापुराण केवल धार्मिक आख्यानों का संकलन नहीं,बल्कि भारतीय सनातन परंपरा में धर्म,कर्तव्य,सदाचार,भक्ति और जीवन मूल्यों का मार्गदर्शन करने वाला महत्वपूर्ण पुराण माना जाता है। कथा के माध्यम से श्रद्धालुओं को सनातन संस्कृति की गहराई,ईश्वर भक्ति तथा मानव जीवन में धार्मिक संस्कारों की उपयोगिता का संदेश दिया जा रहा है। आयोजकों के अनुसार 14 सितंबर से 25 सितंबर तक गणेश मंदिर परिसर में कूर्म महापुराण कथा का आयोजन किया जाएगा। इस दौरान कथावाचक आचार्य मधुसूदन घिल्डियाल की मधुर वाणी से श्रद्धालु प्रतिदिन कथा का श्रवण करेंगे। आयोजन को लेकर क्षेत्र के श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह दिखाई दे रहा है। इस धार्मिक आयोजन में श्रीनगर नगर निगम की महापौर आरती भण्डारी,गणेश मंदिर की मुख्य पुजारी रामकृष्ण पांडे,राजेंद्र प्रसाद बड़थ्वाल,प्रभात पांडे,कुशालानंद भट्ट,हिंदू सम्राट लखपत सिंह भण्डारी,सुरेंद्र चौहान,मुकेश अग्रवाल,पवन बंसल,वीरेंद्र रतूड़ी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्तजन उपस्थित रहे। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की उपस्थिति,वैदिक मंत्रोच्चार,भजन-कीर्तन और धार्मिक वातावरण ने श्रीनगर की प्राचीन आध्यात्मिक परंपरा को जीवंत कर दिया। आयोजन समिति ने सभी श्रद्धालुओं से कथा में अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर पुण्य लाभ अर्जित करने का आह्वान किया है। पौराणिक गणेश मंदिर में शुरू हुआ यह धार्मिक आयोजन आने वाले दिनों में श्रीनगर के आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक वातावरण को और अधिक भक्तिमय बनाएगा। अलकनंदा तट पर गूंजती कथा और भक्ति की स्वर-लहरियां निश्चित रूप से देवभूमि की सनातन परंपरा को नई ऊर्जा प्रदान कर रही हैं।