
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। राजनीति में चुनावी रास्ते अलग हो सकते हैं,लेकिन राजनीतिक विचारधारा और जनसेवा की दिशा हमेशा एक ही रहे,यह जरूरी नहीं। श्रीनगर नगर निगम की महापौर आरती भण्डारी के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद स्थानीय राजनीति में उठ रही चर्चाओं के बीच सनातन धर्म विकास परिषद उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष एवं कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त नृसिंह पीठाधीश्वर स्वामी रसिक महाराज ने इस पूरे घटनाक्रम को एक अलग नजरिए से देखने की बात कही है। उनका कहना है कि आरती भण्डारी के भाजपा में शामिल होने को केवल दलबदल के सामान्य चश्मे से देखना उचित नहीं होगा। इसके पीछे वर्ष 2025 के नगर निगम चुनाव की स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों,टिकट को लेकर बने समीकरण और उस समय की राजनीतिक असहमति को भी समझना आवश्यक है। स्वामी रसिक महाराज के अनुसार आरती भण्डारी का भाजपा में शामिल होना श्रीनगर की स्थानीय राजनीति की महत्वपूर्ण घटना जरूर है,लेकिन इसका मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि उन्होंने कभी भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़ा था। लोकतांत्रिक राजनीति में परिस्थितियां बदलती हैं,राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं और समय के साथ राजनीतिक संवाद के नए रास्ते भी खुलते हैं। निर्दलीय चुनाव लड़ीं और भाजपा प्रत्याशी को दी थी मात वर्ष 2025 में हुए श्रीनगर नगर निगम के प्रथम महापौर चुनाव में आरती भण्डारी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरी थीं। उन्होंने 7,959 मत प्राप्त कर भाजपा की अधिकृत प्रत्याशी आशा उपाध्याय को 1,639 मतों से पराजित किया था। इस चुनाव में कांग्रेस,यूकेडी तथा एक अन्य निर्दलीय प्रत्याशी भी मैदान में थे। स्वामी रसिक महाराज का कहना है कि आरती भण्डारी की यह जीत केवल एक प्रत्याशी की व्यक्तिगत जीत के रूप में नहीं देखी जानी चाहिए,बल्कि यह उस समय श्रीनगर में बने स्थानीय राजनीतिक समीकरणों और मतदाताओं के समर्थन की अभिव्यक्ति भी थी। आरती भण्डारी की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी इस पूरे घटनाक्रम को समझने में महत्वपूर्ण है। वह पूर्व में क्षेत्र पंचायत प्रमुख और जिला पंचायत सदस्य रह चुकी हैं। चुनाव से पहले उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि भाजपा से जुड़े परिवार और स्थानीय राजनीतिक गतिविधियों से भी जुड़ी रही है। ऐसे में चुनाव के दौरान उनका निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरना उस समय भाजपा के भीतर की स्थानीय राजनीतिक असहमति और टिकट से जुड़े समीकरणों के संदर्भ में देखा गया था। इसलिए आज उनके भाजपा में शामिल होने को केवल पहले विरोध और अब साथ के रूप में परिभाषित करना पूरे घटनाक्रम को सीमित नजरिए से देखने जैसा होगा। स्वामी रसिक महाराज के अनुसार पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए मूल प्रश्न यह होना चाहिए कि आरती भण्डारी ने भाजपा प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव भाजपा की विचारधारा के विरोध में लड़ा था अथवा उस समय टिकट और स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों के कारण निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरने का निर्णय लिया था। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की वैचारिक प्रतिबद्धता किसी राजनीतिक दल के प्रति बनी रहती है,लेकिन स्थानीय स्तर पर टिकट अथवा संगठनात्मक परिस्थितियों को लेकर मतभेद उत्पन्न हो जाते हैं और वह स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ता है,तो बाद में उसी दल के साथ पुनः जुड़ने को मात्र अवसरवाद कह देना उचित नहीं होगा। राजनीति में मतभेद,संवाद,परिस्थितियों का बदलना और पुनः साथ आना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। आरती भण्डारी को नगर निगम चुनाव में मिले 7,959 मत इस बात की ओर भी संकेत करते हैं कि उन्हें व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हुआ था। भाजपा प्रत्याशी आशा उपाध्याय को 6,320 मत मिले थे। चुनावी मैदान में कांग्रेस,यूकेडी और अन्य प्रत्याशी भी मौजूद थे। स्वामी रसिक महाराज का कहना है कि आरती भण्डारी की जीत के पीछे स्थानीय स्तर पर बने विभिन्न राजनीतिक एवं सामाजिक समीकरणों की भूमिका रही होगी। इसलिए अब उनके भाजपा में शामिल होने के घटनाक्रम को भी उसी व्यापक राजनीतिक पृष्ठभूमि के साथ समझने की आवश्यकता है। आरती भण्डारी के भाजपा में शामिल होने के बाद राजनीतिक चर्चाओं का दौर स्वाभाविक है। लेकिन स्वामी रसिक महाराज का मानना है कि अब बहस को अतीत के चुनावी मतभेदों तक सीमित रखने के बजाय यह देखना अधिक महत्वपूर्ण होगा कि महापौर के रूप में वह भाजपा के साथ जुड़कर श्रीनगर के विकास और जनता की समस्याओं के समाधान के लिए किस प्रकार काम करती हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक दल और चुनाव महत्वपूर्ण हैं,लेकिन अंततः जनता के हित और क्षेत्र का विकास ही राजनीति की कसौटी होना चाहिए। यदि आरती भण्डारी भाजपा के साथ मिलकर श्रीनगर के विकास,जनसमस्याओं के समाधान और नगर के व्यापक हितों के लिए प्रभावी भूमिका निभाती हैं,तो उनके वर्तमान कार्यों का मूल्यांकन अधिक महत्वपूर्ण होगा। स्वामी रसिक महाराज ने कहा कि राजनीति में स्थायी मित्र और स्थायी विरोध जैसी अवधारणाओं से अधिक महत्वपूर्ण जनता का हित,विकास और विचारधारा है। समय के साथ राजनीतिक परिस्थितियां बदलती हैं और उसी के अनुरूप राजनीतिक समीकरण भी बदलते रहते हैं। उन्होंने कहा कि आरती भण्डारी का भाजपा में शामिल होना इसी बदलते राजनीतिक परिदृश्य का हिस्सा माना जा सकता है। इसे केवल दलबदल की संज्ञा देकर समाप्त कर देना उचित नहीं होगा। वर्ष 2025 के चुनाव की परिस्थितियों,उस समय के राजनीतिक मतभेदों और वर्तमान राजनीतिक समीकरणों को साथ रखकर पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण किया जाना चाहिए। स्वामी रसिक महाराज के इस दृष्टिकोण ने आरती भण्डारी के भाजपा में शामिल होने के मुद्दे को एक नई राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। अब देखना होगा कि भाजपा में शामिल होने के बाद श्रीनगर की राजनीति में महापौर आरती भण्डारी की भूमिका किस दिशा में आगे बढ़ती है और उनके इस निर्णय का नगर की राजनीति तथा विकास कार्यों पर क्या प्रभाव पड़ता है।