1500 वर्ष पुरानी रहस्यमयी गुफा पर जागा संरक्षण का सवाल,शिलाओं पर उकेरी गणेश-शिव-पार्वती की आकृतियों ने बढ़ाया ऐतिहासिक कौतूहल

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी टिहरी/कीर्तिनगर/श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड की पर्वतीय धरती केवल प्राकृतिक सौंदर्य की ही नहीं,बल्कि प्राचीन धार्मिक आस्था,आध्यात्मिक साधना,लोकसंस्कृति और अनमोल ऐतिहासिक धरोहरों की भी साक्षी रही है। पहाड़ की शांत

📘 इन्हें भी पढ़ें

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

टिहरी/कीर्तिनगर/श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड की पर्वतीय धरती केवल प्राकृतिक सौंदर्य की ही नहीं,बल्कि प्राचीन धार्मिक आस्था,आध्यात्मिक साधना,लोकसंस्कृति और अनमोल ऐतिहासिक धरोहरों की भी साक्षी रही है। पहाड़ की शांत वादियों,घने जंगलों और दुर्गम पर्वत श्रृंखलाओं के बीच आज भी अनेक ऐसे स्थल मौजूद हैं,जिनके भीतर इतिहास के अनछुए पन्ने छिपे हुए हैं। ऐसी ही एक प्राचीन एवं रहस्यमयी गुफा की ओर अब हिंसरियाखाल क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने शासन-प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया है। कीर्तिनगर विकासखंड के हिंसरियाखाल क्षेत्र में ग्राम नेल त्वरण के समीप स्थित लगभग 1400 से 1500 वर्ष पुरानी बताई जा रही एक ऐतिहासिक गुफा इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। गुफा के संरक्षण,वैज्ञानिक सर्वेक्षण एवं ऐतिहासिक सत्य को सामने लाने की मांग को लेकर क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता नरेश उमरियाल,विजय कोहली एवं मंगत मटियाला ने संयुक्त रूप से शासन-प्रशासन से ठोस पहल करने की अपील की है। इस प्राचीन गुफा की सबसे बड़ी विशेषता इसके प्रवेश द्वार के समीप स्थित विशाल चट्टान पर दिखाई देने वाली प्राचीन शिल्प आकृतियां हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार चट्टान पर भगवान श्री गणेश,भगवान शिव एवं माता पार्वती की आकृतियां छेनी-हथौड़ी से तराशी गई प्रतीत होती हैं। इन आकृतियों की मौजूदगी इस स्थल को धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है। गुफा के भीतर भी दीवारों पर कुछ प्राचीन चित्रों तथा रहस्यमयी अंक अथवा लिपि जैसे चिह्न दिखाई देने की बात कही गई है। इन चिह्नों का वास्तविक स्वरूप और कालखंड अभी वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं हुआ है,इसलिए सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पुरातत्व विशेषज्ञों से इसके विस्तृत अध्ययन की मांग की है। क्षेत्रीय ग्रामीणों और बुजुर्गों के अनुसार इस गुफा के संबंध में जानकारी उन्हें अपने पूर्वजों से प्राप्त होती रही है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही इन लोकस्मृतियों में गुफा को प्राचीन और धार्मिक महत्व वाला स्थल बताया जाता रहा है। हालांकि गुफा की वास्तविक आयु,निर्माण काल,उपयोग और इससे जुड़े धार्मिक अथवा ऐतिहासिक संदर्भों की पुष्टि केवल वैज्ञानिक एवं पुरातात्विक अध्ययन के बाद ही संभव होगी। यही कारण है कि अब क्षेत्रवासियों की नजर शासन-प्रशासन और पुरातत्व विशेषज्ञों की ओर लगी हुई है। सामाजिक कार्यकर्ता नरेश उमरियाल,विजय कोहली एवं मंगत मटियाला ने मांग की है कि गुफा का विशेषज्ञों की टीम से विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया जाए। उन्होंने पुरातत्व विभाग से गुफा में मौजूद शिल्प आकृतियों,चित्रों,चिह्नों एवं कथित प्राचीन अंकों का अध्ययन कराने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यदि वैज्ञानिक जांच में गुफा की प्राचीनता प्रमाणित होती है तो इसके संरक्षण के लिए आवश्यक कदम तत्काल उठाए जाने चाहिए। साथ ही शिलालेख अथवा अन्य पुरातात्विक अवशेष मिलने पर विशेषज्ञों द्वारा उनका दस्तावेजीकरण किया जाना आवश्यक है। गुफा की एक खास विशेषता इसकी पहुंच को लेकर भी बताई जा रही है। सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार यह स्थल एनएच-58 लक्ष्मोली से चंद्रबदनी रोड होते हुए लगभग 17 किलोमीटर,जामनीखाल स्थित मां चंद्रबदनी मंदिर से लगभग 14 किलोमीटर तथा हिंसरियाखाल मुख्य बाजार से करीब 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यदि इस स्थल का विधिवत सर्वेक्षण और संरक्षण किया जाता है तथा इसे पर्यटन मानचित्र से जोड़ा जाता है तो भविष्य में यह क्षेत्र के धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन का महत्वपूर्ण पड़ाव बन सकता है। मां चंद्रबदनी धाम और देवप्रयाग जैसे धार्मिक स्थलों की यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को यहां एक नया ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक स्थल देखने को मिल सकता है। संरक्षण के साथ स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार की संभावनाएं सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण केवल अतीत को बचाने का प्रयास नहीं,बल्कि भविष्य के लिए नई संभावनाओं का निर्माण भी है। यदि गुफा की प्राचीनता प्रमाणित होती है और इसे योजनाबद्ध ढंग से विकसित किया जाता है तो स्थानीय स्तर पर गाइड,होम-स्टे,स्थानीय उत्पाद,परिवहन और अन्य पर्यटन गतिविधियों के माध्यम से युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों को नुकसान पहुंचाने के बजाय वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उनका संरक्षण किया जाना चाहिए,ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपने क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत से परिचित हो सकें। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जिला प्रशासन टिहरी गढ़वाल से मांग की है कि गुफा तक पहुंचने वाले मार्ग का निरीक्षण कर आवश्यकतानुसार उसे दुरुस्त कराया जाए। स्थल पर सुरक्षा व्यवस्था,दिशा-सूचक एवं जानकारी से संबंधित सूचना बोर्ड लगाए जाएं तथा गुफा के भीतर अथवा आसपास किसी भी प्रकार की तोड़फोड़ और अनधिकृत गतिविधियों को रोका जाए। उन्होंने कहा कि बिना विशेषज्ञों की अनुमति के गुफा की दीवारों पर मौजूद आकृतियों या चिह्नों के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। यह धरोहर जितनी स्थानीय लोगों की आस्था से जुड़ी है,उतनी ही आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास का संभावित दस्तावेज भी हो सकती है। क्षेत्रवासियों का स्पष्ट कहना है कि इस स्थल के संबंध में किसी भी अंतिम ऐतिहासिक निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले विशेषज्ञों द्वारा निष्पक्ष वैज्ञानिक जांच आवश्यक है। उनका आग्रह है कि पुरातत्व विभाग,संस्कृति विभाग और पर्यटन विभाग संयुक्त रूप से स्थल का निरीक्षण करें तथा उपलब्ध साक्ष्यों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण किया जाए। हिंसरियाखाल क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ताओं नरेश उमरियाल,विजय कोहली एवं मंगत मटियाला ने उम्मीद जताई कि जिला प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेते हुए शीघ्र ही संबंधित विभागों को निर्देश देगा। उनका कहना है कि यदि यह गुफा वास्तव में प्राचीन ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व की धरोहर सिद्ध होती है तो इसका संरक्षण पूरे टिहरी गढ़वाल की सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करने वाला कदम होगा। अपीलकर्ता-नरेश उमरियाल सामाजिक कार्यकर्ता एवं महासचिव ब्लॉक कांग्रेस कमेटी कीर्तिनगर,विजय कोहली सामाजिक कार्यकर्ता,हिंसरियाखाल मंगत मटियाला सामाजिक कार्यकर्ता स्थान-ग्राम नेल त्वरण हिंसरियाखाल विकासखंड कीर्तिनगर जनपद टिहरी गढ़वाल।

नवीनतम समाचार – Dainik Himalya Times

नवीनतम समाचार

Loading...