
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड की हिमाच्छादित चोटियों की मौन साधना,भागीरथी और अलकनंदा की अविरल धारा तथा देवदार के घने अरण्यों की गंभीर निस्तब्धता सदियों से जिस शाश्वत सत्य की साक्षी रही है,वह है-ज्ञान का आलोक और गुरु की महिमा। उत्तराखंड केवल प्राकृतिक सौंदर्य की भूमि नहीं,बल्कि ऋषि-मुनियों की तपस्या,चिंतन,साधना और ज्ञान परंपरा की वह पावन धरती है,जहां शिक्षा को कभी मात्र रोजगार का साधन नहीं,बल्कि जीवन को संस्कारित और समाज को दिशा देने वाली साधना माना गया। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सदैव सर्वोच्च रहा है। गुरु केवल वह व्यक्ति नहीं जो पाठ्यपुस्तक के अध्याय पढ़ाता है,बल्कि वह मार्गदर्शक है जो अज्ञान के अंधकार से निकालकर शिष्य को विवेक,संस्कार,चरित्र और जीवन-दृष्टि के प्रकाश तक पहुंचाता है। भारतीय वांग्मय में गुरु को ज्ञान और चेतना के मध्य सेतु माना गया है। अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ यह श्लोक गुरु की उस विराट भूमिका को रेखांकित करता है,जो केवल आंखों को नहीं,बल्कि मनुष्य की अंतर्चेतना को खोलने का कार्य करता है। भारत में प्रतिवर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यह दिवस भारत के महान दार्शनिक,शिक्षाविद् और पूर्व राष्ट्रपति डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के अवसर पर शिक्षकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है। डॉ.राधाकृष्णन ने शिक्षा और शिक्षक की भूमिका को राष्ट्र की बौद्धिक एवं नैतिक शक्ति से जोड़ा। उनका जीवन इस बात का प्रमाण रहा कि शिक्षक केवल कक्षा तक सीमित नहीं होता। एक श्रेष्ठ शिक्षक समाज के विचारों को प्रभावित करता है,पीढ़ियों को दिशा देता है और राष्ट्र के भविष्य की आधारशिला रखता है। इसीलिए शिक्षक दिवस केवल शुभकामनाओं,पुष्पगुच्छों और औपचारिक कार्यक्रमों का अवसर नहीं,बल्कि यह आत्ममंथन का दिन भी है कि हम अपने शिक्षकों को समाज में वह सम्मान,गरिमा और स्वतंत्रता दे पा रहे हैं या नहीं,जिसके वे वास्तविक अधिकारी हैं। देवभूमि की ऋषिकुल परंपरा और गुरु की महत्ता उत्तराखंड की धरती का इतिहास ज्ञान और साधना की महान परंपरा से जुड़ा हुआ है। महर्षि व्यास,गुरु वशिष्ठ और महर्षि कण्व जैसे ऋषियों की ज्ञान परंपरा भारतीय सभ्यता के बौद्धिक वैभव की आधारभूमि रही है। आश्रमों में शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं थी। वहां जीवन जीने की कला,अनुशासन,संयम,कर्तव्य,प्रकृति के प्रति सम्मान और समाज के प्रति उत्तरदायित्व भी सिखाया जाता था। आज शिक्षा व्यवस्था आधुनिक संसाधनों से समृद्ध हुई है,लेकिन शिक्षक की मूल भूमिका आज भी वही है-विद्यार्थी को केवल सफल नहीं,बल्कि योग्य,संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनाना। एक शिक्षक जब कक्षा में प्रवेश करता है तो उसके सामने केवल विद्यार्थियों का समूह नहीं होता,बल्कि देश का भविष्य बैठा होता है। उसकी कही हुई एक बात किसी विद्यार्थी के जीवन की दिशा बदल सकती है। उसका व्यवहार किसी बालक के व्यक्तित्व की नींव रख सकता है और उसका प्रोत्साहन किसी प्रतिभा को ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है। एक कुशल शिक्षक की भूमिका मूर्तिकार के समान होती है। जिस प्रकार मूर्तिकार पत्थर के अनावश्यक हिस्सों को हटाकर उसके भीतर छिपे सुंदर स्वरूप को सामने लाता है,उसी प्रकार शिक्षक विद्यार्थी के भीतर छिपी प्रतिभा,संवेदना और संभावनाओं को पहचानकर उन्हें आकार देता है। विद्यार्थी के भीतर मौजूद भय,संकोच,असफलता की आशंका और आत्मविश्वास की कमी को दूर करना भी शिक्षक के दायित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक शिक्षक किताबें पढ़ाता है,श्रेष्ठ शिक्षक जीवन पढ़ाता है और महान शिक्षक विद्यार्थी को स्वयं को पढ़ना सिखाता है। आज जब बच्चों और युवाओं पर प्रतिस्पर्धा का दबाव बढ़ रहा है,ऐसे समय में शिक्षक का दायित्व और भी महत्वपूर्ण हो गया है। उन्हें विद्यार्थियों को यह समझाना होगा कि सफलता केवल अंकों,पदों और आर्थिक उपलब्धियों का नाम नहीं है। वास्तविक सफलता उस व्यक्तित्व की है जो ज्ञानवान होने के साथ-साथ विनम्र,संवेदनशील,ईमानदार और समाज के प्रति उत्तरदायी हो। तकनीकी युग में शिक्षक की भूमिका और भी महत्वपूर्ण
इक्कीसवीं सदी तकनीक और सूचना का युग है। इंटरनेट,स्मार्टफोन,डिजिटल शिक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने ज्ञान के संसार को अभूतपूर्व रूप से विस्तृत कर दिया है। आज विद्यार्थी कुछ ही क्षणों में दुनिया के किसी भी विषय की जानकारी प्राप्त कर सकता है। लेकिन सूचना और ज्ञान में अंतर है। यंत्र सूचना दे सकते हैं,लेकिन विवेक नहीं। तकनीक उत्तर दे सकती है,लेकिन संवेदना नहीं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता समाधान सुझा सकती है,लेकिन जीवन का मूल्य नहीं समझा सकती। यही कारण है कि तकनीकी युग में शिक्षक की आवश्यकता समाप्त नहीं हुई,बल्कि उसकी भूमिका और अधिक व्यापक हो गई है। अब शिक्षक को केवल विषय विशेषज्ञ नहीं,बल्कि मार्गदर्शक,प्रेरक,परामर्शदाता और चरित्र-निर्माता की भूमिका निभानी होगी। विद्यार्थियों को तकनीक का उपयोग करना सिखाने के साथ-साथ यह भी बताना होगा कि तकनीक का दुरुपयोग कैसे रोका जाए,डिजिटल दुनिया में जिम्मेदार नागरिक कैसे बना जाए और सूचना के महासागर में सत्य-असत्य के बीच अंतर कैसे पहचाना जाए। राष्ट्र निर्माण की पहली पाठशाला है विद्यालय किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी इमारतों,सड़कों या आर्थिक संपन्नता से अधिक उसकी युवा पीढ़ी के चरित्र में होती है। जिस देश के युवाओं में ज्ञान के साथ अनुशासन,कर्तव्य-बोध,राष्ट्रप्रेम,सामाजिक समरसता और मानवीय संवेदना होगी, वह राष्ट्र निश्चित रूप से सशक्त बनेगा। विद्यालय में शिक्षक केवल विद्यार्थियों को परीक्षा के लिए तैयार नहीं करता,वह उन्हें जीवन की परीक्षा के लिए तैयार करता है। वह उनमें संविधान के प्रति सम्मान,प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी,समाज के प्रति संवेदना और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य का भाव विकसित करता है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि महान व्यक्तित्वों के निर्माण में उनके गुरुओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। चाणक्य और चंद्रगुप्त की कथा भारतीय इतिहास में गुरु-शिष्य संबंध की शक्ति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह बताती है कि सही दिशा और सही मार्गदर्शन किसी सामान्य प्रतिभा को असाधारण उपलब्धि तक पहुंचा सकता है। आज शिक्षक के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। बदलती जीवनशैली,परिवारों में घटता संवाद,सोशल मीडिया का प्रभाव,बढ़ती प्रतिस्पर्धा,मानसिक दबाव और उपभोक्तावादी सोच ने विद्यार्थियों के सामने नई समस्याएं खड़ी की हैं। ऐसे समय में शिक्षक को केवल पाठ्यक्रम पूरा करने की चिंता तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे विद्यार्थी की प्रतिभा के साथ उसकी संवेदनाओं को भी समझना होगा। कक्षा ऐसी जगह बने जहां विद्यार्थी प्रश्न पूछने से न डरें,असफल होने पर टूटें नहीं और अपनी कमजोरियों को सुधारने का अवसर प्राप्त करें। शिक्षक और विद्यार्थी के बीच विश्वास का रिश्ता मजबूत होगा तो शिक्षा व्यवस्था भी अधिक प्रभावी होगी। शिक्षक दिवस पर समाज को शिक्षकों के सम्मान की बात करने के साथ-साथ उनके सामने मौजूद वास्तविक चुनौतियों पर भी विचार करना चाहिए। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए प्रशिक्षित और प्रेरित शिक्षक,बेहतर शैक्षिक संसाधन,पर्याप्त समय और सम्मानजनक कार्य वातावरण आवश्यक हैं। शिक्षक को यदि हर स्तर पर केवल प्रशासनिक दायित्वों और गैर-शैक्षणिक कार्यों में उलझा दिया जाएगा तो उसके मूल शिक्षण दायित्व पर भी प्रभाव पड़ेगा। इसलिए आवश्यक है कि शिक्षक को ऐसा वातावरण मिले जिसमें वह पूरी ऊर्जा के साथ विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण पर ध्यान केंद्रित कर सके। शिक्षक दिवस केवल एक दिन शिक्षकों को याद करने का अवसर नहीं होना चाहिए। यह समाज के लिए संकल्प का पर्व बने कि वह शिक्षक को केवल कर्मचारी नहीं,बल्कि राष्ट्र के भविष्य का निर्माता समझेगा। शिक्षक वर्ग के लिए भी यह अवसर आत्ममंथन का है कि शिक्षा को केवल नौकरी नहीं,बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र-निर्माण के महान यज्ञ के रूप में देखा जाए। एक शिक्षक के हाथ में चॉक और किताब भले ही दिखाई देती हो,लेकिन वास्तव में उसके हाथ में आने वाली पीढ़ियों का भविष्य होता है। उसकी कक्षा में लिखे जाने वाले शब्द आने वाले वर्षों में समाज के चरित्र के रूप में दिखाई देते हैं। देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरती से शिक्षक दिवस पर यही संदेश प्रसारित होना चाहिए कि ज्ञान का सम्मान केवल शब्दों में नहीं,बल्कि व्यवहार में हो। शिक्षक की गरिमा सुरक्षित रहे,विद्यार्थी में जिज्ञासा जीवित रहे और शिक्षा व्यवस्था में संस्कार,विज्ञान तथा मानवीय मूल्यों का संतुलित समावेश हो। आज आवश्यकता ऐसे शिक्षकों की है जो विद्यार्थियों को केवल नौकरी पाने योग्य नहीं,बल्कि राष्ट्र को बेहतर बनाने योग्य नागरिक बनाएं। कल समाज का शिक्षक,वैज्ञानिक,चिकित्सक,सैनिक,प्रशासक,जनप्रतिनिधि,पत्रकार,उद्यमी और राष्ट्र का नेतृत्वकर्ता बनेगा। इसलिए शिक्षक का सम्मान वास्तव में भारत के भविष्य का सम्मान है। शिक्षक दिवस के इस पावन अवसर पर उन सभी गुरुजनों को कोटि-कोटि नमन,जिन्होंने अपने ज्ञान,तप,त्याग,अनुशासन और स्नेह से असंख्य जीवनों को दिशा दी। उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम ज्ञान की ज्योति को आगे बढ़ाएं और ऐसी पीढ़ी का निर्माण करें जो आधुनिकता के साथ अपनी संस्कृति,मानवीय मूल्यों और राष्ट्रधर्म से भी जुड़ी रहे। क्योंकि राष्ट्र की सबसे मजबूत नींव संसदों में नहीं,बल्कि उन कक्षाओं में रखी जाती है जहां एक शिक्षक पूरी निष्ठा से भविष्य के भारत को गढ़ रहा होता है।