
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग,बिड़ला परिसर की ओर से भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी डिजिटल युग में उत्तराखंड की लोक-संस्कृति और लोकप्रिय संस्कृति के दूसरे दिन लोक-संस्कृति के संरक्षण,संवर्धन,दस्तावेजीकरण,नवाचार और वैश्विक प्रसार को लेकर गंभीर एवं सार्थक मंथन हुआ। अकादमिक विमर्श के साथ उत्तराखंड के लोककलाकारों की सजीव प्रस्तुतियों ने सभागार को लोक रंगों से सराबोर कर दिया। संगोष्ठी के दूसरे दिन तृतीय अकादमिक सत्र से लेकर समापन सत्र तक उत्तराखंड की समृद्ध लोक-परंपराओं को आधुनिक तकनीक से जोड़ने,युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने तथा प्रदेश की लोककलाओं को देश-दुनिया तक पहुंचाने की संभावनाओं पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। विभिन्न विश्वविद्यालयों से पहुंचे शिक्षकों एवं शोधार्थियों ने विविध विषयों पर कुल 30 शोध-पत्रों का वाचन कर लोक-संस्कृति के विभिन्न आयामों को अकादमिक दृष्टि से सामने रखा। दूसरे दिन के तृतीय अकादमिक सत्र का शुभारंभ प्रातः 10 बजे हुआ। सत्र की अध्यक्षता एमएमटीसी के निदेशक प्रो.डी.एस.नेगी ने की,जबकि संचालन डॉ.अनूप सेमवाल ने किया। इस अवसर पर उत्तराखंड की लोक-संस्कृति के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय योगदान के लिए युवा लोककलाकार अरविंद चौहान एवं अनुराग नौटियाल को प्रतीक चिह्न एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। लोककलाकार अरविंद चौहान ने अपने गीतों की मनमोहक प्रस्तुति के माध्यम से उत्तराखंड की प्राचीन एवं नवीन संगीत परंपराओं के समन्वय की आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने प्रसिद्ध गढ़वाली लोकगाथा जीतू बगड़वाल की गीतात्मक प्रस्तुति देकर श्रोताओं को लोक-परंपरा की गहराई से परिचित कराया। उनके अनुसार पारंपरिक पर्वतीय वाद्ययंत्रों के साथ आधुनिक एवं पाश्चात्य वाद्ययंत्रों का संतुलित समावेश लोकगीतों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। इसके बाद युवा लोकगायक अनुराग नौटियाल ने पारंपरिक मांगल गीत की प्रस्तुति से वातावरण को भावपूर्ण बना दिया। उन्होंने कहा कि डिजिटल माध्यमों ने लोककलाओं और प्रतिभावान युवाओं के लिए नए अवसरों के द्वार खोले हैं। अब आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाला कलाकार भी अपनी प्रतिभा को व्यापक मंच तक पहुंचा सकता है। उन्होंने कहा कि देश-विदेश में रह रहे प्रवासी उत्तराखंडियों को अपनी मिट्टी,भाषा,संस्कृति और परंपराओं से जोड़े रखने में पर्वतीय लोकगीत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। सत्र के मुख्य अतिथि डॉ.अजय कुमार सिंह ने कहा कि लोक-संस्कृति को केवल अतीत की धरोहर मानकर सीमित नहीं किया जा सकता। संस्कृति की वास्तविक शक्ति उसकी प्रवाहशीलता,परिवर्तनशीलता और समय के साथ स्वयं को नए रूप में प्रस्तुत करने की क्षमता में निहित है। उन्होंने कहा कि लोक-संस्कृति को रूढ़ियों में बांधने के बजाय उसमें नवाचार की संभावनाओं को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि डिजिटल युग ने उत्तराखंड की लोक-संस्कृति को राष्ट्रीय ही नहीं,बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का अभूतपूर्व अवसर उपलब्ध कराया है। आवश्यकता इस बात की है कि इस अवसर का योजनाबद्ध,रचनात्मक और निरंतर उपयोग किया जाए। लोक-परंपराओं को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए युवाओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना भी जरूरी है। अपने संबोधन के अंत में डॉ.अजय कुमार सिंह ने उत्तराखंड की लोक-संस्कृति को समर्पित गीत प्रस्तुत किया,जिससे पूरा सभागार भावविभोर हो उठा। इसके पश्चात विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए शोधार्थियों ने लोकभाषा,लोकगीत,लोकगाथा,सांस्कृतिक पहचान,आधुनिक तकनीक और लोकप्रिय संस्कृति सहित विभिन्न विषयों पर शोध-पत्र प्रस्तुत किए। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो.डी.एस.नेगी ने सभी वक्ताओं,शोधार्थियों एवं श्रोताओं का आभार व्यक्त करते हुए संगोष्ठी के सफल आयोजन के लिए आयोजन समिति की सराहना की। उन्होंने कहा कि लोक-संस्कृति के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक कार्य की संभावनाएं मौजूद हैं। इन संभावनाओं को साकार करने के लिए निरंतर शोध,दस्तावेजीकरण और रचनात्मक प्रयास आवश्यक हैं। सत्र के अंत में हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो.मंजुला राणा ने सभी अतिथियों,वक्ताओं एवं श्रोताओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। भोजनावकाश के बाद आयोजित समापन सत्र में भी लोक-संस्कृति और डिजिटल माध्यमों के संबंध को लेकर सार्थक विमर्श हुआ। समापन सत्र की अध्यक्षता अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो.ओ.पी.गुसाईं ने की। विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो.वाई.पी.रेवानी मुख्य अतिथि तथा प्रो.राजेंद्र सिंह नेगी उपनिदेशक चौरास परिसर विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। समापन सत्र में उत्तराखंड की प्रसिद्ध लोकगायिका अंजली खरे एवं लोकगायक सचिन पुसौला ने अपनी सुमधुर लोकगीत प्रस्तुतियों से सभागार में मौजूद श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनके गीतों में उत्तराखंड की लोक-संस्कृति,पहाड़ की जीवनशैली,परंपराओं और बदलते समय के बीच लोककला की भूमिका को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया गया। लोककलाकारों की प्रस्तुतियों ने यह संदेश भी दिया कि तकनीक और आधुनिकता लोक-संस्कृति के लिए चुनौती मात्र नहीं हैं,बल्कि सही दिशा में उपयोग किए जाने पर यही माध्यम लोककला के संरक्षण और व्यापक प्रसार का सशक्त साधन बन सकते हैं। इस सत्र में भी विभिन्न विषयों पर 15 शोध-पत्रों का वाचन किया गया। संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में शोध-पत्र प्रस्तुत करने वाले देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए शिक्षकों एवं शोधार्थियों को मुख्य अतिथियों द्वारा प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए। लोक-संस्कृति समाज की समापन सत्र के मुख्य अतिथि कुलसचिव प्रो.वाई.पी.रैवानी ने कहा कि लोक-संस्कृति किसी भी समाज की सामूहिक स्मृति और उसकी पहचान का आधार होती है। डिजिटल माध्यमों ने लोक-संस्कृति को व्यापक समाज तक पहुंचाने के नए अवसर उपलब्ध कराए हैं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों में आयोजित इस प्रकार की संगोष्ठियां विद्यार्थियों और शोधार्थियों को अपनी लोकपरंपराओं को समझने तथा उनके संरक्षण की दिशा में कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं। उन्होंने उत्तराखंड की लोक-संस्कृति के दस्तावेजीकरण और डिजिटल अभिलेखीकरण पर विशेष जोर देते हुए कहा कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखना सामूहिक जिम्मेदारी है। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो.ओपी.गुसाईं ने कहा कि लोकसंस्कृति केवल अतीत की विरासत नहीं,बल्कि वर्तमान जीवन की जीवंत अभिव्यक्ति है। उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक का उपयोग लोक-परंपराओं को समाप्त करने के लिए नहीं,बल्कि उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए किया जाना चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों और युवाओं को अपनी जड़ों,भाषा,लोकगीतों,लोकगाथाओं और परंपराओं से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि बदलते दौर में संस्कृति को जीवंत बनाए रखने के लिए परंपरा और तकनीक के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना होगा। प्रो.राजेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि उत्तराखंड की लोक-संस्कृति अत्यंत समृद्ध,विविधतापूर्ण और विशिष्ट है। डिजिटल तकनीक ने इसके संरक्षण,दस्तावेजीकरण और प्रसार की संभावनाओं को कई गुना बढ़ा दिया है। उन्होंने कहा कि लोककलाओं को उनके मूल संदर्भ और प्रामाणिकता के साथ डिजिटल माध्यमों पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए,ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक विरासत को सही रूप में समझ सकें। समापन सत्र का संचालन डॉ.अनूप सेमवाल ने किया। हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो.मंजुला राणा ने सभी अतिथियों,वक्ताओं,शोधार्थियों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी के संयोजक डॉ.कपिल देव पंवार ने सभी अतिथियों,वक्ताओं,शोधार्थियों,आयोजन समिति के सदस्यों,विश्वविद्यालय के अधिकारियों,शिक्षकों,कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने कहा कि सभी के सहयोग और सहभागिता से दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल रही। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की लोक-संस्कृति को समय के साथ जीवंत बनाए रखना केवल कलाकारों या शोधकर्ताओं की जिम्मेदारी नहीं,बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग की सामूहिक जिम्मेदारी है। डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के दौर में लोकभाषा,लोकगीत,लोकगाथा,लोकनृत्य,लोकवाद्य और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक मंचों से जोड़कर नई पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है। इसी के साथ दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का औपचारिक समापन हुआ। संगोष्ठी ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि यदि परंपरा की जड़ों को मजबूत रखते हुए आधुनिक तकनीक का रचनात्मक उपयोग किया जाए तो उत्तराखंड की लोकसंस्कृति न केवल संरक्षित रह सकती है,बल्कि देश की सीमाओं से निकलकर वैश्विक सांस्कृतिक मंच पर अपनी विशिष्ट पहचान भी स्थापित कर सकती है।