
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
पौड़ी/श्रीनगर गढ़वाल। शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार और भावी पीढ़ी को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से जोड़ने की दिशा में शिक्षकों की भूमिका को और अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय में नवोदय विद्यालय समिति (एनवीएस) के शिक्षकों के लिए आयोजित चार दिवसीय क्षमता संवर्धन कार्यक्रम का गुरुवार को भव्य एवं गरिमामय समापन हुआ। चार दिनों तक चले इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में आधुनिक शिक्षण पद्धतियों,सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी,कृत्रिम बुद्धिमत्ता,डिजिटल शैक्षणिक संसाधनों,अनुभवात्मक अधिगम तथा दक्षता आधारित शिक्षा के विभिन्न पहलुओं पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की मूल भावना के अनुरूप शिक्षकों को नवीन शैक्षणिक दृष्टिकोण,तकनीकी दक्षता और नवाचार आधारित शिक्षण पद्धतियों से परिचित कराना रहा,ताकि विद्यालयों में शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रहकर विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास,तार्किक चिंतन,रचनात्मकता,वैज्ञानिक दृष्टिकोण और व्यावहारिक ज्ञान का माध्यम बन सके। प्रशिक्षण कार्यक्रम के तृतीय दिवस आयोजित विभिन्न तकनीकी एवं शैक्षणिक सत्रों में प्रतिभागी शिक्षकों ने सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) आधारित पाठ योजनाओं तथा अनुभवात्मक अधिगम गतिविधियों का प्रभावशाली प्रस्तुतिकरण किया। विशेषज्ञों ने कक्षा शिक्षण को अधिक रोचक,सरल,संवादात्मक और परिणामोन्मुख बनाने के लिए डिजिटल संसाधनों एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता के व्यावहारिक उपयोग की जानकारी दी। इस दौरान तकनीक आधारित मूल्यांकन,विद्यार्थी-केंद्रित शिक्षण,डिजिटल सामग्री के चयन तथा आधुनिक शैक्षणिक मंचों के प्रभावी उपयोग पर विस्तार से चर्चा की गई। फेट (PhET),खान अकादमी,जियोजेब्रा,एनसीईआरटी एवं एनपीटीईएल जैसे डिजिटल शैक्षणिक मंचों की उपयोगिता से भी प्रतिभागियों को अवगत कराया गया। शिक्षकों ने विज्ञान के प्रयोगों,पर्यावरण संरक्षण,भूमिका-अभिनय तथा मानवीय मूल्यों पर आधारित गतिविधियों के माध्यम से करके सीखने की अवधारणा को प्रस्तुत किया। विशेषज्ञों ने कहा कि आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थी को केवल जानकारी देना पर्याप्त नहीं है,बल्कि उसे विषयवस्तु को समझने,प्रश्न पूछने,प्रयोग करने और अपने अनुभवों के आधार पर निष्कर्ष निकालने के लिए प्रेरित करना भी आवश्यक है। कार्यक्रम के अंतर्गत प्रतिभागी शिक्षकों को विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग स्थित संग्रहालय का शैक्षणिक भ्रमण भी कराया गया। इस दौरान प्रो.फरस्वाण ने शिक्षकों को संग्रहालय में संरक्षित प्राचीन पुरावशेषों,मूर्तियों,पांडुलिपियों और हिमालयी सांस्कृतिक विरासत के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व की जानकारी दी। इस शैक्षणिक भ्रमण का उद्देश्य शिक्षकों को पुस्तकीय ज्ञान से आगे बढ़कर प्रत्यक्ष अनुभव के माध्यम से भारतीय इतिहास,सभ्यता और संस्कृति को समझने का अवसर प्रदान करना था। इस पहल ने शिक्षा में विरासत आधारित अधिगम और स्थानीय सांस्कृतिक ज्ञान के महत्व को भी रेखांकित किया। कार्यक्रम के अंतिम दिवस शिक्षकों के सतत व्यावसायिक विकास से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विशेषज्ञ व्याख्यान आयोजित किए गए। इनमें राष्ट्रीय शिक्षक व्यावसायिक मानक (एनपीएसटी),राष्ट्रीय मेंटरिंग मिशन (एनएमएम),स्व-निर्देशित अधिगम,कार्यात्मक अनुसंधान तथा सतत व्यावसायिक विकास (सीपीडी) जैसे विषय प्रमुख रहे। प्रो.सीमा धवन,डॉ.नीतू शर्मा,डॉ.पुनीत वालिया,डॉ.देवेंद्र सिंह एवं डॉ.आशु रौलेट सहित विभिन्न विशेषज्ञों ने शिक्षकों को आत्ममूल्यांकन,सहयोगात्मक अधिगम,नवाचार और शिक्षण पद्धतियों में निरंतर सुधार के लिए प्रेरित किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि एक प्रभावी शिक्षक वही है,जो स्वयं भी निरंतर सीखता रहे और समय के साथ बदलती शैक्षणिक आवश्यकताओं को समझते हुए अपने ज्ञान एवं कौशल का विस्तार करता रहे। समापन समारोह में डॉ.शंकर सिंह ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया,जबकि डॉ.कविता भट्ट ने कार्यक्रम का कुशल संचालन किया। समारोह की अध्यक्षता करते हुए प्रो.एम.एम.सेमवाल ने कहा कि शिक्षक समाज और राष्ट्र निर्माण की आधारशिला हैं। बदलते शैक्षिक परिवेश में शिक्षकों का दायित्व और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर हो रहे बदलावों के अनुरूप शिक्षकों को आजीवन सीखने की प्रवृत्ति विकसित करनी होगी तथा नवीन शिक्षण पद्धतियों को अपनाकर विद्यार्थियों के भविष्य को बेहतर बनाने में योगदान देना होगा। समारोह के मुख्य अतिथि प्रो.दीपक कुमार ने शिक्षण प्रक्रिया में आधुनिक तकनीक के सार्थक एवं प्रभावी उपयोग पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक का उद्देश्य केवल कक्षाओं में उपकरणों का प्रयोग करना नहीं,बल्कि विद्यार्थियों की सहभागिता बढ़ाना,विषयों को सरलता से समझाना और शिक्षण को अधिक संवादात्मक एवं विद्यार्थी-केंद्रित बनाना होना चाहिए। प्रो.ए.के.नौटियाल ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा,नैतिक मूल्यों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के समन्वय की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आधुनिक शिक्षा को अपनी सांस्कृतिक एवं बौद्धिक विरासत से जोड़ते हुए विद्यार्थियों में वैज्ञानिक सोच और मानवीय संवेदनाओं का विकास करना समय की आवश्यकता है। वहीं प्रो.आर.एस.नेगी ने विश्वविद्यालयों और विद्यालयों के मध्य शैक्षणिक सहयोग को शिक्षा में नवाचार एवं गुणवत्ता सुधार का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षण संस्थानों के अनुभव,अनुसंधान और शैक्षणिक संसाधनों का लाभ विद्यालयी शिक्षा को भी मिलना चाहिए। प्रशिक्षण से शिक्षकों की दक्षता और शैक्षणिक गुणवत्ता को मिलेगी नई दिशा
कार्यक्रम की समन्वयक प्रो.सीमा धवन ने चार दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने प्रशिक्षण के दौरान आयोजित विभिन्न शैक्षणिक एवं तकनीकी सत्रों,विशेषज्ञ व्याख्यानों,गतिविधियों और प्रतिभागियों की सक्रिय सहभागिता की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के क्षमता संवर्धन कार्यक्रम शिक्षकों की व्यावसायिक दक्षताओं को मजबूत करने के साथ-साथ विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कार्यक्रम को सफल बनाने में सहयोग देने वाले सभी विशेषज्ञों,अतिथियों,प्रतिभागी शिक्षकों तथा आयोजन से जुड़े सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। समारोह में डॉ.आलोक सागर गौतम,डॉ.सुमनलता तिरुवा,डॉ.सपना सेन,डॉ.अनित कौर,डॉ.रीना आर्य,राम कुमार,सूरज सिंह,विपिन सिंह,स्नेहलता,प्रेरणा बहुगुणा एवं नमिता सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक,अधिकारी एवं कर्मचारी तथा नवोदय विद्यालय समिति के प्रतिभागी शिक्षक उपस्थित रहे। आधुनिक शिक्षा की चुनौतियों के अनुरूप शिक्षक तैयार करने की सार्थक पहल
चार दिवसीय क्षमता संवर्धन कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि वर्तमान समय में शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता,डिजिटल संसाधनों,अनुभवात्मक अधिगम और नवाचार आधारित शिक्षण ने विद्यालयी शिक्षा के सामने नए अवसरों के साथ नई चुनौतियां भी प्रस्तुत की हैं। ऐसे में शिक्षकों का तकनीकी रूप से दक्ष,विषयगत रूप से समृद्ध और शैक्षणिक दृष्टि से नवाचारी होना आवश्यक है। गढ़वाल विश्वविद्यालय में आयोजित यह प्रशिक्षण कार्यक्रम शिक्षकों को आधुनिक शैक्षणिक आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करने तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की भावना को विद्यालयों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं सार्थक पहल साबित हुआ।