हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड अपनी सनातन संस्कृति,लोक परंपराओं,देवी-देवताओं की आराधना और आध्यात्मिक विरासत के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध रही है। यहां की देव डोलियां,थान,चौकी,जागर और लोकदेवताओं की परंपरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं,बल्कि लोकआस्था,सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का जीवंत प्रतीक हैं। सदियों से इन परंपराओं का उद्देश्य समाज में धर्म,नैतिकता,सेवा,सद्भाव और जनकल्याण का संदेश देना रहा है। लेकिन वर्तमान समय में एक चिंताजनक प्रवृत्ति तेजी से सामने आ रही है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे यूट्यूब और फेसबुक पर देव डोलियां,चावल देखना,चौकी सजाना,थान सजाना और देवी-देवताओं के नाम पर अनेक वीडियो लगातार प्रसारित किए जा रहे हैं। इनमें से कई लोग स्वयं को धार्मिक मार्गदर्शक या चमत्कारी बताकर लोगों की आस्था का लाभ उठाते दिखाई देते हैं। समाज के अनेक जागरूक लोगों का मानना है कि जहां श्रद्धा और भक्ति का स्थान होना चाहिए,वहां धीरे-धीरे प्रदर्शन,प्रचार और आर्थिक लाभ की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। गरीब और असहाय लोग अपनी समस्याओं के समाधान की उम्मीद में ऐसे लोगों तक पहुंचते हैं और कई बार आर्थिक रूप से भी शोषण का शिकार हो जाते हैं। यदि धर्म सेवा का माध्यम बनने के बजाय कमाई का साधन बन जाए,तो यह समाज और संस्कृति दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले जब देव डोलियां हरिद्वार स्नान के लिए जाती थीं,तब श्रद्धालु अपने निकटवर्ती नगरों में जाकर दर्शन कर लिया करते थे। उस समय उद्देश्य केवल श्रद्धा और परंपरा का निर्वहन होता था। आज कई स्थानों पर स्नान के बाद भी अलग-अलग जगहों पर दर्शन के नाम पर बड़ी भीड़ जुटाने,प्रचार-प्रसार करने और धार्मिक आयोजनों को भव्य प्रदर्शन का रूप देने की प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। इससे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कहीं हमारी प्राचीन परंपराएं आडंबर और व्यवसाय का माध्यम तो नहीं बनती जा रही हैं। धर्म का वास्तविक स्वरूप सेवा,सत्य,संयम,करुणा और लोककल्याण है। हमारे देवी-देवता कभी भी अंधविश्वास,भय या धन के प्रदर्शन का संदेश नहीं देते। वे सदैव श्रद्धा, सादगी और निष्काम भक्ति का मार्ग दिखाते हैं। इसलिए प्रत्येक श्रद्धालु का भी यह कर्तव्य है कि वह विवेक के साथ धर्म का पालन करे और किसी भी व्यक्ति के झूठे दावों या चमत्कारों के प्रभाव में आने से पहले सत्य की जांच अवश्य करे। आज आवश्यकता इस बात की है कि देवभूमि की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गरिमा को बनाए रखने के लिए समाज,धार्मिक विद्वानों,जनप्रतिनिधियों और प्रशासन को भी जागरूक भूमिका निभानी चाहिए। हमारी लोक परंपराएं किसी व्यक्ति विशेष की कमाई का माध्यम नहीं,बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर हैं। यदि समय रहते समाज जागरूक नहीं हुआ,तो आने वाले वर्षों में हमारी पवित्र परंपराओं का मूल स्वरूप प्रभावित हो सकता है। इसलिए आस्था को अंधविश्वास से,श्रद्धा को व्यापार से और धर्म को दिखावे से बचाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। धर्म वहीं है जहां सत्य,सेवा और सद्भाव हों,जहां केवल धन कमाने की लालसा हो,वहां समाज को सजग रहने की आवश्यकता है। देवभूमि की पहचान उसकी पवित्र आस्था,लोक संस्कृति और सनातन परंपराओं से है,न कि धर्म के नाम पर होने वाले दिखावे और व्यापार से। आइए हम सब मिलकर अपनी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करें,ताकि आने वाली पीढ़ियां भी देवभूमि को उसी श्रद्धा और गौरव के साथ देख सकें,जिसके लिए उत्तराखण्ड विश्वभर में सम्मानित है।