
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड की पहचान केवल ऊंचे-ऊंचे पहाड़, घने जंगल और पवित्र नदियों से ही नहीं है,बल्कि यहां के मेहनती किसान भी इसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। लेकिन पिछले कई वर्षों से खेती में कम आमदनी और रोजगार के अवसरों की कमी के कारण बड़ी संख्या में युवा गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। ऐसे समय में गेंदे के फूल की खेती पहाड़ के किसानों और बेरोजगार युवाओं के लिए नई उम्मीद बनकर सामने आ रही है। यदि गांवों में सिंचाई के लिए थोड़ी-सी पानी की व्यवस्था हो जाए, तो गेंदे की खेती बहुत अच्छी आमदनी दे सकती है। इस फसल को दूसरी कई फसलों की तुलना में कम पानी की आवश्यकता होती है। वर्षा का पानी, छोटे सिंचाई स्रोत, गूल, नौले-धारे, प्राकृतिक जलस्रोत या बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति से भी इसकी खेती आसानी से की जा सकती है। लगभग दो से ढाई महीने में पौधों पर फूल आने लगते हैं और कई महीनों तक लगातार फूल मिलते रहते हैं। उत्तराखंड धार्मिक आस्था और पर्यटन का प्रदेश है। बदरीनाथ,केदारनाथ,गंगोत्री,यमुनोत्री,हरिद्वार,ऋषिकेश सहित हजारों मंदिरों में प्रतिदिन गेंदे के फूलों की जरूरत पड़ती है। इसके अलावा शादी-विवाह,मेले,भंडारे,देवी-देवताओं की पूजा,सरकारी कार्यक्रम,सांस्कृतिक आयोजन और स्वागत समारोहों में भी गेंदे के फूलों की मांग पूरे वर्ष बनी रहती है। यदि स्थानीय किसान इन फूलों का उत्पादन करें तो बाहर से फूल मंगाने की जरूरत कम होगी और किसानों की आय भी बढ़ेगी। गेंदे की प्रमुख किस्में भारत में मुख्य रूप से गेंदे की दो प्रमुख किस्में उगाई जाती हैं। अफ्रीकी गेंदा के फूल बड़े,गोल और आकर्षक पीले तथा नारंगी रंग के होते हैं। इनका उपयोग सबसे अधिक मंदिरों,मालाओं,धार्मिक आयोजनों और विवाह समारोहों में किया जाता है। इसकी पैदावार अधिक होने के कारण किसान इसे अधिक पसंद करते हैं। फ्रांसीसी गेंदा के पौधे छोटे होते हैं,लेकिन इनमें लाल,पीले,नारंगी और कई रंगों के सुंदर फूल खिलते हैं। इनका उपयोग घरों,बगीचों,पार्कों और पर्यटन स्थलों की सजावट में अधिक किया जाता है। इसके अलावा कई उन्नत किस्में भी विकसित की गई हैं,जिनमें पूसा नारंगी,पूसा बसंती,पूसा अर्पिता,अर्का अग्नि,अर्का बंगारा,अर्का पराग,कैलकट्टा नारंगी और कैलकट्टा पीला प्रमुख हैं। उत्तराखंड की जलवायु में ये किस्में अच्छी पैदावार देने के लिए जानी जाती हैं। एक खेती,अनेक रोजगार
गेंदे की खेती केवल फूल बेचने तक सीमित नहीं है। इससे मालाएं बनाना,पूजा के लिए फूलों की आपूर्ति करना,पौधे तैयार करना,बीज तैयार करना,गांव में छोटे-छोटे फूल बिक्री केंद्र खोलना और सजावट का काम भी किया जा सकता है। महिला स्वयं सहायता समूह,किसान समूह और बेरोजगार युवा मिलकर इसे छोटे उद्योग का रूप देकर अच्छी आमदनी कमा सकते हैं। खेती और पर्यावरण दोनों के लिए लाभदायक गेंदे के पौधे खेतों के लिए भी लाभकारी माने जाते हैं। इनसे कई हानिकारक कीट कम होते हैं,मधुमक्खियों की संख्या बढ़ती है और दूसरी फसलों में भी अच्छा उत्पादन मिलता है। यही कारण है कि कई किसान सब्जियों और अन्य फसलों के साथ भी गेंदे की खेती करते हैं। जरूरत है सरकार और किसानों के संयुक्त प्रयास की यदि उद्यान विभाग,कृषि विभाग,ग्राम पंचायतें और किसान मिलकर गांव-गांव में गेंदे की खेती को बढ़ावा दें,किसानों को अच्छे पौधे,खेती का प्रशिक्षण,सिंचाई की सुविधा और फूल बेचने के लिए उचित बाजार उपलब्ध कराएं,तो हजारों युवाओं को अपने गांव में ही रोजगार मिल सकता है। इससे महिलाओं की आय बढ़ेगी,किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और पलायन जैसी गंभीर समस्या को भी काफी हद तक रोका जा सकेगा। आज समय की मांग है कि पारंपरिक खेती के साथ-साथ फूलों की खेती को भी अपनाया जाए। देवभूमि उत्तराखंड की जलवायु,धार्मिक महत्व और पर्यटन गतिविधियां इस खेती के लिए बहुत अनुकूल हैं। यदि योजनाबद्ध तरीके से काम किया जाए तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड के गांव सुनहरे गेंदे के फूलों से महक उठेंगे। यह केवल फूलों की खेती नहीं होगी,बल्कि गांवों की खुशहाली,युवाओं के रोजगार और किसानों की समृद्धि की नई शुरुआत होगी।