
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
देवप्रयाग/श्रीनगर गढ़वाल। जहां एक ओर पावन गंगा और अलकनंदा का संगम भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का प्रतीक है,वहीं रविवार को इसी दिव्य धरा पर नन्हे बालकों की संस्कृत वाणी और वैदिक मंत्रोच्चार ने वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत कर दिया। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर द्वारा आयोजित प्रबोधन कार्यशाला के अंतर्गत संगम तट पर श्री विष्णु सहस्रनाम के 1008 पाठ संपन्न हुए,जिसने देवप्रयाग को भक्ति,संस्कार और वैदिक परंपरा के अद्भुत उत्सव में परिवर्तित कर दिया। इस विशेष आयोजन में मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती तथा पतंजलि योगपीठ के सह-संस्थापक आचार्य बालकृष्ण की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम को और भी विशेष बना दिया। संगम तट पर जब बालगुरुकुलम् के नन्हे विद्यार्थियों ने एक स्वर में विष्णु सहस्रनाम का पाठ आरंभ किया,तो पूरा वातावरण मंत्रमुग्ध हो उठा। श्रद्धालु और उपस्थित अतिथि बच्चों की अद्भुत स्मरण शक्ति,शुद्ध उच्चारण और संस्कृत के प्रति समर्पण को देखकर अभिभूत नजर आए। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर के अंतर्गत संचालित श्री रघुनाथ कीर्ति बालगुरुकुलम् में नवप्रवेशी विद्यार्थियों के लिए एक माह की प्रबोधन कार्यशाला आयोजित की जा रही है। इस कार्यशाला का उद्देश्य विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा,संस्कृत भाषा,शास्त्रों,सुभाषितों और नैतिक मूल्यों से परिचित कराना है। विभिन्न विषयों के विद्वान आचार्य बच्चों को शास्त्रीय ज्ञान,जीवन मूल्यों और भारतीय संस्कृति की गहराइयों से अवगत करा रहे हैं। कार्यशाला के अंतर्गत अधिमास ज्येष्ठ पूर्णिमा के पावन अवसर पर आयोजित यह सामूहिक विष्णु सहस्रनाम पाठ विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। विद्यार्थियों ने अपने अध्यापकों के मार्गदर्शन में 1008 बार श्री विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर सनातन संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन का प्रेरक संदेश दिया। इस अवसर पर उमा भारती ने बच्चों को आशीर्वाद देते हुए कहा कि संस्कृत और शास्त्रों के मार्ग पर अग्रसर यह नई पीढ़ी सनातन संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति है। उन्होंने कहा कि आज जब आधुनिकता के दौर में भारतीय परंपराओं को समझने और आगे बढ़ाने की आवश्यकता है,तब ऐसे गुरुकुल राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना को सशक्त बनाने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए कहा कि यही बालक आने वाले समय में भारतीय ज्ञान परंपरा के सच्चे वाहक बनेंगे। पतंजलि योगपीठ के सह-संस्थापक आचार्य बालकृष्ण ने भी विद्यार्थियों के साथ बैठकर विष्णु सहस्रनाम का पाठ किया। उन्होंने बालगुरुकुलम् की सराहना करते हुए कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं,बल्कि भारत की आत्मा और ज्ञान-विज्ञान की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयास बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं और उनमें नैतिकता,अनुशासन तथा राष्ट्रभावना का विकास करते हैं। विष्णु सहस्रनाम पाठ के उपरांत संगम तट पर दीपदान और भव्य गंगा आरती का आयोजन किया गया। सैकड़ों दीपों की जगमगाहट और वैदिक मंत्रों की ध्वनि ने पूरे संगम क्षेत्र को अलौकिक आभा से भर दिया। उपस्थित श्रद्धालुओं ने इस दिव्य दृश्य को आध्यात्मिक अनुभूति का अद्वितीय क्षण बताया। कार्यक्रम में परिसर निदेशक प्रो.पी.वी.बी.सुब्रमण्यम ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि बालगुरुकुलम् का उद्देश्य केवल शिक्षा देना नहीं,बल्कि भारतीय संस्कृति,अध्यात्म और नैतिक मूल्यों से युक्त आदर्श नागरिक तैयार करना है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कार्यक्रम के समापन पर सभी विद्यार्थियों और श्रद्धालुओं को खीर का प्रसाद वितरित किया गया। पूरे आयोजन ने यह संदेश दिया कि संस्कृत,संस्कृति और संस्कारों की यह अमूल्य विरासत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है,जितनी सदियों पहले थी और नई पीढ़ी इसे आगे बढ़ाने के लिए पूरी निष्ठा के साथ तैयार है।