
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
पौड़ी/श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरती पर प्रकृति,संस्कृति और संस्कारों का सदियों पुराना गहरा संबंध रहा है। यहां जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रत्येक संस्कार को प्रकृति और पर्यावरण से जोड़ने की समृद्ध परंपरा रही है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए जनपद पौड़ी गढ़वाल के राठ क्षेत्र के अंतर्गत विकासखंड थलीसैंण की पट्टी कण्डारस्यूं के ग्राम कोठी में एक भावपूर्ण एवं प्रेरणादायी पहल देखने को मिली। स्व.हर्षपति गोदियाल की स्मृति में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के समापन अवसर पर वार्षिक पिंडदान संस्कार के उपरांत उनके पुत्र आशीष गोदियाल एवं कथावाचक इन्द्रदेव खंकरियाल ने सड़क किनारे देवदार का समलौंण पौधा रोपकर दिवंगत पिता को श्रद्धांजलि अर्पित की। पौधारोपण के दौरान विधि-विधान एवं धार्मिक भावनाओं के साथ स्व.हर्षपति गोदियाल की आत्मा की शांति एवं मोक्ष की कामना करते हुए ईश्वर से प्रार्थना की गई। इस अवसर पर पौधे के संरक्षण एवं संवर्धन का संकल्प स्वर्गीय हर्षपति गोदियाल की धर्मपत्नी गुड्डी देवी ने पंडित सौरभ गौड़ के माध्यम से लिया। यह संकल्प केवल एक पौधे की देखभाल तक सीमित नहीं,बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति संरक्षण,पारिवारिक संस्कार और सामाजिक उत्तरदायित्व की जीवंत मिसाल बन गया। कथावाचक इन्द्रदेव खंकरियाल ने कहा कि पौधारोपण स्वयं में एक पुण्य कार्य है। पुण्यात्मा की स्मृति में रोपा गया यह देवदार का पौधा जब पल्लवित और पोषित होकर विशाल वृक्ष का रूप लेगा,तो वह न केवल स्व.हर्षपति गोदियाल की स्मृतियों को जीवंत रखेगा,बल्कि आने वाले समय में पूरे गांव और समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की लोक परंपराओं में प्रकृति को देवतुल्य माना गया है। जंगल,जल और जमीन यहां की जीवनशैली एवं संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। ऐसे में प्रत्येक संस्कार के साथ पौधारोपण को जोड़ना पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अत्यंत सार्थक पहल है। उन्होंने समलौंण संस्था की इस अनूठी पहल की सराहना करते हुए कहा कि जन्म,विवाह,धार्मिक अनुष्ठान अथवा किसी पुण्यात्मा की स्मृति-हर अवसर को पौधारोपण से जोड़कर समाज प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा सकता है। उन्होंने सभी लोगों से अपने जीवन के महत्वपूर्ण संस्कारों एवं अवसरों पर पौधारोपण कर उसे वृक्ष बनने तक संरक्षित करने का आह्वान किया। समलौंण पौधारोपण की यह पहल उत्तराखंड की पारंपरिक पर्यावरणीय चेतना को आधुनिक सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का कार्य कर रही है। किसी दिवंगत परिजन की स्मृति में पौधा लगाना जहां भावनात्मक रूप से परिवार को प्रकृति से जोड़ता है,वहीं उस पौधे की जिम्मेदारी लेना समाज के प्रति उत्तरदायित्व का संदेश भी देता है। ग्राम कोठी में रोपा गया देवदार का पौधा आने वाले वर्षों में जब विशाल वृक्ष का रूप लेगा,तब उसकी छांव में खड़े होकर ग्रामीण अपने पूर्वज की स्मृतियों को महसूस कर सकेंगे। इस प्रकार एक पौधा परिवार की भावनाओं,धार्मिक आस्था,पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक संस्कारों का प्रतीक बन गया है। इस अवसर पर कृष्णबल्लभ गोदियाल,बीरेंद्र दत्त गोदियाल,महीन गोदियाल,बलदेव गोदियाल,गिरीश चंद्र गोदियाल,दीपक गोदियाल,दिवाकर गोदियाल,हिमांशु गोदियाल,दिनकर गोदियाल,संगीता देवी गोदियाल,पुष्पा देवी गोदियाल,अनीता देवी गोदियाल,लक्ष्मी देवी गोदियाल,आनन्दी देवी गोदियाल,पीताम्बरी देवी रतूड़ी,विधाता देवी,बसन्ती देवी,बीना देवी,रीना देवी,मीनाक्षी देवी,इस्मिता देवी,कुमारी चेतना,दिव्या,ज्योति,सोनम,सतीष चन्द्र गोदियाल,प्रकाश चन्द्र गोदियाल सहित बड़ी संख्या में परिजन एवं ग्रामीण मौजूद रहे। कार्यक्रम में आचार्य नरोत्तम पंत,प्रकाश पंत,हरीश चंद्र नौड़ियाल,सुमित पंत,ज्ञानानन्द गौड़ सहित अन्य गणमान्य लोगों ने भी सहभागिता की। इस अवसर पर गांव की समलौंण सेना की उपस्थिति ने कार्यक्रम को सामाजिक एवं पर्यावरणीय दृष्टि से और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया। कार्यक्रम का संचालन समलौंण संस्था के संस्थापक बीरेंद्र दत्त गोदियाल ने किया। ग्राम कोठी में पिता की स्मृति में रोपा गया यह देवदार आज भले ही एक छोटा पौधा है,लेकिन आने वाले समय में यह एक ऐसी जीवंत स्मृति बनेगा,जिसकी जड़ों में पारिवारिक प्रेम,तने में संस्कार और शाखाओं में पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिखाई देगा। देवभूमि की यही परंपरा प्रकृति को पूजने के साथ-साथ उसे संवारने और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने की प्रेरणा देती है।