बंजर जमीन से हरित क्रांति तक-एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय का चित्रा गार्डन बना जलवायु संरक्षण का राष्ट्रीय माॅडल

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी श्रीनगर गढ़वाल। जलवायु परिवर्तन और बढ़ते पर्यावरणीय संकट के दौर में यदि वैज्ञानिक सोच,दूरदृष्टि और प्रकृति के प्रति समर्पण एक साथ जुड़ जाएं तो बंजर धरती भी हरित भविष्य

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

श्रीनगर गढ़वाल। जलवायु परिवर्तन और बढ़ते पर्यावरणीय संकट के दौर में यदि वैज्ञानिक सोच,दूरदृष्टि और प्रकृति के प्रति समर्पण एक साथ जुड़ जाएं तो बंजर धरती भी हरित भविष्य की नई कहानी लिख सकती है। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय का चित्रा गार्डन आज इसी सकारात्मक परिवर्तन का सशक्त उदाहरण बनकर सामने आया है। कभी सूखी,पथरीली और अनुपयोगी रही 3.5 हेक्टेयर भूमि आज घने मिश्रित वन के रूप में विकसित होकर न केवल जैव विविधता का समृद्ध केंद्र बन चुकी है,बल्कि जलवायु परिवर्तन से मुकाबले में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार इस वन ने मात्र छह वर्षों में लगभग 85 टन कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण (कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन) कर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। यह प्रेरणादायी पहल तत्कालीन कुलपति प्रो.अन्नपूर्णा नौटियाल के दूरदर्शी नेतृत्व में शुरू हुई। उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध केंद्र (हैप्रेक) के निदेशक डॉ.विजयकांत पुरोहित तथा विश्वविद्यालय के अनुरक्षण विभाग के सहायक अभियंता महेश डोभाल के अथक प्रयासों से वर्ष 2020 तक बंजर पड़ी इस भूमि को योजनाबद्ध तरीके से विकसित किया गया। आज यहां लगभग 2,500 वृक्ष और 40 से अधिक स्थानीय एवं फलदार प्रजातियों का सघन मिश्रित वन तैयार हो चुका है,जो पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ वैज्ञानिक अनुसंधान और जन-जागरूकता का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है। चित्रा गार्डन में जामुन,शहतूत,आंवला,बेल,बांज,बांस,सेब,खुबानी सहित अनेक स्थानीय एवं फलदार प्रजातियों का उच्च घनत्व वाले मिश्रित वृक्षारोपण मॉडल के तहत रोपण किया गया। यही विविधता आज इस वन को प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने और अधिक कार्बन अवशोषित करने में सक्षम बना रही है। हैप्रेक के निदेशक डॉ.विजयकांत पुरोहित ने बताया कि हाल ही में किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण में चित्रा गार्डन में लगभग 23 टन कार्बन संग्रहित पाया गया है,जो लगभग 85 टन कार्बन डाइऑक्साइड के सुरक्षित जैविक भंडारण के बराबर है। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ विकसित किए गए मिश्रित वन जलवायु परिवर्तन की चुनौती से प्रभावी ढंग से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वैज्ञानिक डॉ.राजीव वशिष्ठ ने बताया कि चित्रा गार्डन प्रतिवर्ष लगभग 14 टन कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण से अवशोषित कर रहा है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि शहतूत और जामुन की प्रजातियां कुल कार्बन संग्रहण में लगभग 58 प्रतिशत योगदान देती हैं। वहीं डेंकन और आंवला को शामिल करने पर केवल चार प्रमुख प्रजातियां कुल कार्बन संग्रहण का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा सुनिश्चित कर रही हैं। प्रति पौधा कार्बन अवशोषण क्षमता के आधार पर बांस और परिपक्व आंवला सबसे अधिक प्रभावी प्रजातियां पाई गई हैं। हैप्रेक के वरिष्ठ वैज्ञानिक सुदीप सेमवाल ने कहा कि यदि चित्रा गार्डन जैसे मिश्रित वन मॉडल को उत्तराखंड की 1,000 हेक्टेयर बंजर भूमि पर लागू किया जाए तो लगभग 24 हजार टन कार्बन डाइऑक्साइड का सुरक्षित भंडारण संभव है। यदि यही मॉडल एक लाख हेक्टेयर क्षेत्र में अपनाया जाए तो लगभग 24 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड का कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन किया जा सकता है। इससे न केवल पर्यावरण संरक्षण को नई दिशा मिलेगी,बल्कि भविष्य में कार्बन क्रेडिट के माध्यम से राज्य को आर्थिक लाभ प्राप्त होने की भी व्यापक संभावनाएं बन सकती हैं। शोधार्थी जयदेव चौहान ने बताया कि चित्रा गार्डन का सूक्ष्म जलवायु (माइक्रो क्लाइमेट) श्रीनगर बाजार क्षेत्र की तुलना में लगभग दो डिग्री सेल्सियस तक ठंडा रहता है। इसके अलावा यहां पक्षियों,तितलियों और मधुमक्खियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है,जो इस क्षेत्र में जैव विविधता के तेजी से विकसित होने का प्रमाण है। उन्होंने बताया कि अब तक 250 से अधिक किसानों,विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को जैव विविधता संरक्षण,औषधीय पौधों के महत्व,प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन तथा पर्यावरण संरक्षण संबंधी प्रशिक्षण प्रदान किया जा चुका है। कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन का वैज्ञानिक आकलन वृक्षों के व्यास (डायमीटर) एवं ऊंचाई के विस्तृत मापन के आधार पर किया गया है। चित्रा गार्डन आज केवल एक हरित परिसर नहीं,बल्कि यह इस बात का जीवंत उदाहरण है कि यदि वैज्ञानिक अनुसंधान,दूरदर्शी नेतृत्व और प्रकृति के प्रति संवेदनशील सोच का समन्वय हो तो बंजर भूमि भी जलवायु संरक्षण,जैव विविधता संवर्धन और सतत विकास का राष्ट्रीय मॉडल बन सकती है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के लिए यह पहल भविष्य की पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने की दिशा में आशा की नई किरण बनकर उभरी है।

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