
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। कीर्तिनगर विकासखंड के मलेथा के समीप सिरोला गांव में मरे हुए बकरे का मांस खाने के बाद बीमार पड़े चार बच्चों और उनकी मां के लिए सोमवार का दिन राहत और खुशियों से भरा रहा। बेस अस्पताल श्रीकोट में तीन दिन तक चले उपचार के बाद अमन,सपना,ऋषभ,प्रियांशु और उनकी मां पार्वती देवी की हालत में उल्लेखनीय सुधार होने पर चिकित्सकों ने उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी। बच्चों के स्वस्थ होकर मां के साथ घर लौटने पर परिवार में राहत का माहौल है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे भावुक दृश्य उस समय देखने को मिला,जब बच्चों की दादी लखपति देवी ने अपने पोतों को स्वस्थ अवस्था में अस्पताल से विदा होते देखा। तीन दिनों तक अस्पताल में रहकर बच्चों की सेवा-सुश्रूषा करने वाली दादी की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। संकट की घड़ी में बच्चों के सिरहाने बैठी दादी के लिए पोतों का स्वस्थ होकर घर लौटना किसी बड़ी खुशी से कम नहीं था। बताया गया कि सिरोला गांव में मरे हुए बकरे का मांस खाने के करीब तीन दिन बाद ग्रामीणों में स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें सामने आने लगी थीं। इसके बाद कई ग्रामीण अलग-अलग अस्पतालों में उपचार के लिए पहुंचे। इसी क्रम में शनिवार को चार बच्चे और उनकी मां भी बेस अस्पताल श्रीकोट पहुंचे। बच्चों की हालत उस समय चिंताजनक थी,जिसके चलते उन्हें तत्काल बाल रोग विभाग के वार्ड में भर्ती कर उपचार शुरू किया गया। वहीं उनकी मां पार्वती देवी को मेडिसिन विभाग में भर्ती कर चिकित्सकों की निगरानी में उपचार दिया गया। मांस के सेवन के बाद बच्चों और महिला में उल्टी-दस्त,पेट दर्द,डायरिया,बुखार,कमजोरी और शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन जैसे लक्षण सामने आए थे। बच्चों का रक्तचाप भी सामान्य स्थिति में नहीं था। ऐसे में चिकित्सकों ने बिना किसी देरी के उपचार शुरू किया और उनकी स्थिति पर लगातार निगरानी रखी। लगातार करीब तीन दिनों तक चले उपचार,दवाइयों और चिकित्सकीय निगरानी के बाद बच्चों की हालत में धीरे-धीरे सुधार आने लगा। उनकी स्वास्थ्य स्थिति स्थिर होने के बाद सोमवार को चिकित्सकों ने उन्हें अस्पताल से छुट्टी देने का निर्णय लिया। बच्चों के स्वस्थ होकर घर लौटने पर परिवार के साथ अस्पताल के चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ ने भी राहत की सांस ली। बच्चों का उपचार बेस अस्पताल के बाल रोग विभाग के एचओडी डॉ.सीएम शर्मा की निगरानी में किया गया। बाल रोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ.अंकिता गिरी और सीनियर रेजिडेंट डॉ.अजय गोस्वामी ने बच्चों की स्थिति को देखते हुए तत्काल उपचार शुरू किया। उपचार के दौरान डॉ.जाहिद,डॉ.आकाश सहित नर्सिंग अधिकारी भगवत सिंह,जसपाल,नेहा रावत,नीतू और अनीता ने भी बच्चों की देखभाल और उपचार में सहयोग किया। चिकित्सकों की तत्परता और नर्सिंग स्टाफ की निरंतर देखभाल से बच्चों की हालत में लगातार सुधार दर्ज किया गया। बाल रोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ.अंकिता गिरी ने ग्रामीणों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह देते हुए कहा कि किसी भी परिस्थिति में मरे हुए पशु का मांस नहीं खाना चाहिए। विशेष रूप से बरसात के मौसम में ऐसे मांस के सेवन से संक्रमण और खाद्य विषाक्तता का खतरा बढ़ सकता है। उन्होंने बताया कि इस प्रकार के मांस के सेवन से उल्टी-दस्त,डिहाइड्रेशन,बुखार और गंभीर संक्रमण जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। संक्रमण गंभीर होने पर शरीर के अन्य अंग भी प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि सिरोला के बच्चों को समय पर अस्पताल पहुंचाया गया,जिसके कारण उनका उचित उपचार संभव हुआ और उनकी स्थिति में सुधार आया। उन्होंने ग्रामीणों से अपील की कि किसी भी व्यक्ति में इस प्रकार के लक्षण दिखाई देने पर घरेलू उपचार या लापरवाही करने के बजाय तत्काल नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल में चिकित्सकीय सलाह लें। तीन दिन तक पोतों के सिरहाने बैठी रहीं दादी बच्चों की छुट्टी के दौरान अस्पताल में सबसे भावुक पल उनकी दादी लखपति देवी के लिए रहा। पोतों की तबीयत बिगड़ने के बाद से वह तीन दिनों तक अस्पताल में उनके साथ रहीं। कभी सिर पर हाथ फेरतीं, कभी पानी पिलातीं तो कभी उनकी तबीयत के बारे में चिकित्सकों से जानकारी लेतीं। संकट के इन तीन दिनों में दादी की पूरी दुनिया अपने पोतों के इर्द-गिर्द सिमट गई थी। सोमवार को जब चारों बच्चे स्वस्थ होकर अपनी मां के साथ घर जाने के लिए तैयार हुए तो दादी की आंखों में खुशी के आंसू छलक पड़े। उन्होंने चिकित्सकों,नर्सिंग स्टाफ और सहयोग करने वाले ग्रामीणों का आभार जताते हुए कहा कि मुश्किल समय में सभी ने उनका साथ दिया। अस्पताल में बच्चों को समय पर उपचार और बेहतर देखभाल मिली,जिसके चलते आज उनके पोते स्वस्थ होकर घर लौट रहे हैं। इसी बीच उपचार की आवश्यकता वाले मरीज रजत को भी सफलतापूर्वक एयरलिफ्ट कर उच्च स्तरीय उपचार के लिए भेजा गया। समय पर चिकित्सकीय निर्णय और त्वरित कार्रवाई से मरीज को बेहतर उपचार उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। गंभीर स्वास्थ्य परिस्थितियों में समय पर अस्पताल पहुंचना और आवश्यकता पड़ने पर उच्च चिकित्सा केंद्र तक पहुंचाना जीवन बचाने में निर्णायक भूमिका निभाता है। सिरोला की घटना ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य पदार्थों की सुरक्षा को लेकर किसी भी प्रकार की लापरवाही भारी पड़ सकती है। वहीं बेस अस्पताल के चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ की तत्परता ने यह साबित किया कि समय पर सही उपचार मिले तो गंभीर स्थिति से भी मरीज को सुरक्षित बाहर निकाला जा सकता है।