रिश्तों की तरह सहेजें जा रहें वृक्ष-समलौण आंदोलन से प्रकृति संरक्षण बन रहा जनसंस्कार

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी पौड़ी/श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड की लोक संस्कृति,धार्मिक परंपराओं और पर्यावरण संरक्षण को एक सूत्र में पिरोता समलौण आंदोलन आज जन-जन के जीवन का हिस्सा बनता जा रहा है। जीवन के

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

पौड़ी/श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड की लोक संस्कृति,धार्मिक परंपराओं और पर्यावरण संरक्षण को एक सूत्र में पिरोता समलौण आंदोलन आज जन-जन के जीवन का हिस्सा बनता जा रहा है। जीवन के प्रत्येक महत्वपूर्ण अवसर को प्रकृति से जोड़ने की इस अनूठी पहल के तहत जनपद पौड़ी गढ़वाल में दो अलग-अलग अवसरों पर समलौण पौधारोपण कर पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रेरक संदेश दिया गया। विकासखंड थलीसैंण की पट्टी चोपड़ा कोर्ट अंतर्गत ग्राम सभा जखोला में स्व.अजीतराम धस्माना के परिवार द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के पावन अवसर पर धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण का सुंदर संगम देखने को मिला। कथा आयोजन के दौरान व्यास पीठ पर विराजमान आचार्य शिवम ढौंडियाल,आचार्य कैलाश नैनवाल,आचार्य हरीश पोखरियाल,आचार्य राकेश मंमगाई,आचार्य अमित पुरोहित,आचार्य हिमांशु लखेड़ा,हंसेश्वर महादेव की माईजी तथा कलश यात्रा में शामिल महिला मंगल दल और ग्रामवासियों की उपस्थिति में परिवार द्वारा नारंगी का समलौण पौधा रोपा गया। इस अवसर पर स्वर्गीय अजीतराम धस्माना की धर्मपत्नी सुशीला धस्माना,पुत्र चंद्र प्रकाश धस्माना,पुत्रवधू प्रीति धस्माना,नीतिश शर्मा,अपराजिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों ने पौधारोपण कर इसे प्रकृति के प्रति अपनी श्रद्धा और जिम्मेदारी का प्रतीक बताया। पौधे के संरक्षण की जिम्मेदारी स्वयं सुशीला देवी ने ग्रहण की। वहीं दूसरी ओर सिविल सोयम गढ़वाल वन प्रभाग के अंतर्गत पाबों रेंज में कार्यरत वन क्षेत्राधिकारी भूपेन्द्र सिंह नेगी के सेवानिवृत्ति अवसर को भी पर्यावरण संरक्षण से जोड़ते हुए उनके बुआखाल स्थित निवास पर नारंगी का समलौण पौधा रोपा गया। इस अवसर को केवल विदाई समारोह तक सीमित न रखते हुए प्रकृति के नाम समर्पित किया गया,जिससे आने वाली पीढ़ियों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश मिल सके। पौधे के संरक्षण की जिम्मेदारी उनकी धर्मपत्नी अनुसूया देवी ने ली। कार्यक्रम का संचालन समलौण आंदोलन की राज्य संयोजिका सावित्री देवी मंमगाई ने किया। उन्होंने कहा कि समलौण केवल पौधारोपण का अभियान नहीं,बल्कि मानव और प्रकृति के बीच भावनात्मक संबंध स्थापित करने का एक सांस्कृतिक आंदोलन है। जन्म,विवाह,धार्मिक अनुष्ठान,सेवानिवृत्ति और अन्य महत्वपूर्ण अवसरों पर लगाए गए पौधे परिवार की स्मृतियों और संस्कारों से जुड़ जाते हैं, जिसके कारण उनका संरक्षण भी सहज रूप से होता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में पर्यावरणीय चुनौतियों और बढ़ते जलवायु संकट के बीच समलौण जैसी पहल समाज को प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का बोध करा रही है। उन्होंने क्षेत्रवासियों से वनों को आग से बचाने,अधिकाधिक वृक्षारोपण करने और लगाए गए पौधों के संरक्षण का संकल्प लेने का आह्वान किया। कार्यक्रम में श्रवण सिंह नेगी,प्रेरणा वाटिका के संस्थापक लक्ष्मण सिंह नेगी,प्रकृति प्रेमी सीमा भण्डारी,सिमरन रावत,प्रदीप मंमगाई,कविता देवी,वन विभाग के कर्मचारी तथा बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे। समळौण आंदोलन की यह पहल आज उत्तराखंड में सांस्कृतिक विरासत,धार्मिक आस्था, सामाजिक सरोकार और पर्यावरण संरक्षण के अद्भुत संगम के रूप में उभर रही है। यह अभियान लोगों को केवल पौधे लगाने के लिए ही नहीं,बल्कि उन्हें परिवार के सदस्य की तरह संरक्षित करने की प्रेरणा भी दे रहा है।

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