
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड की धार्मिक,सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक नगरी श्रीनगर स्थित श्री गणेश मंदिर में आयोजित श्री कूर्म महापुराण कथा के चतुर्थ दिवस श्रद्धा,भक्ति और आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा व्यासपीठ से आचार्य मधुसूदन घिल्डियाल ने माता सती के त्याग, मां पार्वती के पुनः आविर्भाव,देवी माहात्म्य तथा भगवान विश्वकर्मा के दिव्य स्वरूप का विस्तारपूर्वक वर्णन कर श्रद्धालुओं को धर्म,आस्था और कर्तव्य के गहन संदेश से अभिभूत किया। कथा के दौरान मंदिर परिसर में भगवान के नाम का गुणगान,धार्मिक आख्यानों का श्रवण और आध्यात्मिक वातावरण श्रद्धालुओं को भक्ति के भाव में सराबोर करता रहा। श्रद्धालुओं ने एकाग्रचित्त होकर कथा का श्रवण किया तथा सनातन धर्म की गौरवशाली परंपराओं और पौराणिक प्रसंगों के माध्यम से जीवन के आध्यात्मिक मूल्यों को समझने का प्रयास किया। कथा व्यास आचार्य मधुसूदन घिल्डियाल ने देवी माहात्म्य का वर्णन करते हुए बताया कि आदिशक्ति जगत की मूल चेतना हैं। उन्हीं की शक्ति से सृष्टि का संचालन होता है तथा समस्त जीव-जगत में ऊर्जा,करुणा,सृजन और संरक्षण का भाव विद्यमान रहता है। उन्होंने माता सती के दक्ष प्रजापति के यहां अवतरण तथा भगवान शिव के साथ उनके विवाह से जुड़े प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा में दक्ष प्रजापति द्वारा आयोजित यज्ञ का प्रसंग सुनाते हुए बताया गया कि यज्ञ में भगवान शिव का अनादर किए जाने से माता सती अत्यंत व्यथित हुईं। अपने आराध्य भगवान शिव के प्रति किए गए अपमान को सहन न कर पाने के कारण माता सती ने योगाग्नि में अपना देह त्याग दिया। यह प्रसंग सुनकर कथा पंडाल में उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। इसके पश्चात मां पार्वती के रूप में माता सती के पुनः हिमवान के यहां आविर्भाव का वर्णन किया गया। आचार्य ने बताया कि आदिशक्ति का यह दिव्य स्वरूप संसार को धर्म,तपस्या,त्याग,नारी शक्ति और आध्यात्मिक साधना का संदेश प्रदान करता है। कथा के दौरान हिमवान द्वारा मां की स्तुति तथा देवी द्वारा हिमवान को दिए गए दिव्य उपदेशों का भी विस्तार से वर्णन किया गया। आचार्य ने कहा कि भारतीय सनातन परंपरा में देवी को केवल शक्ति का प्रतीक नहीं,बल्कि ज्ञान,करुणा,सृजन और लोककल्याण की अधिष्ठात्री माना गया है। उन्होंने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि मनुष्य को अपने जीवन में सत्य,संयम,सदाचार,सेवा और परोपकार के मार्ग पर चलना चाहिए। धार्मिक कथाओं का वास्तविक उद्देश्य केवल पौराणिक प्रसंगों का श्रवण करना नहीं,बल्कि उनके माध्यम से जीवन को संस्कारित करना और समाज में सद्भाव,प्रेम तथा नैतिक मूल्यों को मजबूत करना है। कथा के चतुर्थ दिवस भगवान विश्वकर्मा के दिव्य स्वरूप और उनकी महिमा का भी उल्लेख किया गया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि के दिव्य शिल्पकार,निर्माण-कला,वास्तु,तकनीक और सृजनात्मक कौशल का अधिष्ठाता माना जाता है। कथा में बताया गया कि भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना में सहयोग के लिए भगवान विश्वकर्मा का आविर्भाव किया। पौराणिक परंपराओं में स्वर्गलोक,इन्द्रलोक और द्वारिकापुरी जैसे दिव्य नगरों के निर्माण का श्रेय भगवान विश्वकर्मा को दिया गया है। इसके साथ ही विभिन्न दिव्य अस्त्र-शस्त्रों की रचना से जुड़ी मान्यताओं में भी उनका विशेष स्थान है। भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र और भगवान शिव के त्रिशूल सहित अनेक दिव्य आयुधों के निर्माण से संबंधित पौराणिक प्रसंगों का उल्लेख करते हुए भगवान विश्वकर्मा की शिल्पकला और सृजन शक्ति की महत्ता बताई गई। कथा व्यास ने कहा कि भारतीय संस्कृति में निर्माण,श्रम,तकनीक,शिल्प और कर्म को सदैव सम्मान दिया गया है। भगवान विश्वकर्मा की आराधना इसी परंपरा का प्रतीक है। यंत्रों,औजारों,मशीनरी तथा कार्य में उपयोग होने वाले उपकरणों का पूजन केवल धार्मिक परंपरा नहीं,बल्कि श्रम,कौशल,साधनों और सृजन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है। उन्होंने कहा कि आधुनिक युग में उद्योग,निर्माण,कृषि,परिवहन,तकनीकी क्षेत्र और विभिन्न व्यवसायों में प्रयुक्त मशीनरी तथा उपकरण मानव जीवन को सुगम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में इन साधनों की सुरक्षा,उचित उपयोग और उनके प्रति सम्मान का भाव समाज में जिम्मेदारी और कार्यसंस्कृति को मजबूत करता है। कूर्म महापुराण कथा के माध्यम से श्रद्धालुओं को धर्म,आध्यात्मिकता और सामाजिक जीवन के बीच समन्वय का संदेश दिया गया। कथा में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि सनातन परंपरा समाज को केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रखती,बल्कि सेवा,सहयोग,सद्भाव,कर्तव्यनिष्ठा और लोककल्याण की प्रेरणा भी देती है। श्री गणेश मंदिर में आयोजित यह धार्मिक आयोजन क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत,धार्मिक आस्था और सामाजिक एकता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। कथा के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी पौराणिक परंपराओं,देवी-देवताओं की महिमा और सनातन संस्कृति के मूल्यों से परिचित होने का अवसर मिल रहा है। कूर्म महापुराण कथा के चतुर्थ दिवस भुवन चंद्र थपलियाल एवं सुरेन्द्र दत्त जोशी मुख्य यजमान रहे। धार्मिक अनुष्ठान में मुख्य यजमानों ने श्रद्धापूर्वक सहभागिता करते हुए कथा आयोजन की परंपरा को आगे बढ़ाया। इस अवसर पर व्यासपीठ पर आचार्य मधुसूदन घिल्डियाल के साथ विद्वान पंडित मनीष डोभाल,वीरेन्द्र दत्त घिल्डियाल,संदीप पुरोहित,मनोज बंगवाल,संदीप उनियाल,भुवनेश भट्ट,नवीन सैफ तथा चन्द्र प्रकाश नैथानी उपस्थित रहे। कथा आयोजन में गणेश मंदिर के मुख्य पुजारी रामकृष्ण पाण्डे एवं प्रभात पाण्डे सहित आयोजक मंडल के सहयोगी मुकेश जोशी,कुशलानंद राघव जोशी,पवन बंसल,सुरेंद्र चौहान,हिमांशु अग्रवाल,राजेंद्र प्रसाद बड़थ्वाल आदि ने महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया। कथा के समापन अवसर पर श्रद्धालुओं ने भगवान विश्वकर्मा से समस्त समाज के कल्याण,सुख-समृद्धि,शांति और मंगलमय जीवन की कामना की। उपस्थित श्रद्धालुओं ने कहा कि ऐसे धार्मिक आयोजन समाज में आध्यात्मिक चेतना जागृत करने के साथ-साथ सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण और सामाजिक एकता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।