
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। हिंदी दिवस एवं उत्तराखंड के प्रकृति के चितेरे महान कवि स्व.चंद्र कुंवर बर्त्वाल की पुण्यतिथि के अवसर पर हिमालयन साहित्य एवं कला परिषद् श्रीनगर की ओर से एक गरिमामय एवं भावपूर्ण साहित्यिक आयोजन किया गया। कार्यक्रम में हिंदी भाषा की व्यापकता,उसकी सांस्कृतिक चेतना तथा राष्ट्रीय एकीकरण में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका पर गंभीर विमर्श हुआ। साथ ही हिंदी साहित्य की गौरवशाली परंपरा,वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य तथा नई पीढ़ी में साहित्य के प्रति रुचि जागृत करने की आवश्यकता पर साहित्यकारों एवं विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए। संस्था के वरिष्ठ संरक्षक कृष्णा नंद मैठाणी की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम का वातावरण साहित्यिक संवेदना,भाषा प्रेम और सांस्कृतिक चेतना से ओत-प्रोत रहा। वक्ताओं ने कहा कि हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं,बल्कि भारत की विविध भाषायी एवं सांस्कृतिक परंपराओं को एक सूत्र में पिरोने वाली सशक्त कड़ी है। हिंदी ने देश के विभिन्न क्षेत्रों,समाजों और संस्कृतियों के बीच भावनात्मक सेतु का कार्य किया है। वर्तमान समय में हिंदी के संरक्षण,संवर्धन और उसके साहित्यिक वैभव को नई पीढ़ी तक पहुंचाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। कार्यक्रम में हिंदी साहित्य की गौरवशाली थाती पर चर्चा करते हुए साहित्यकारों ने कहा कि हिंदी साहित्य ने समाज को दिशा देने के साथ-साथ समय-समय पर सामाजिक विसंगतियों,मानवीय संवेदनाओं,प्रकृति,संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना को अपनी अभिव्यक्ति प्रदान की है। बदलते समय और तकनीकी युग में हिंदी साहित्य के सामने नई चुनौतियां हैं,लेकिन साहित्य की प्रासंगिकता आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आवश्यकता इस बात की है कि साहित्य को विद्यालयों,महाविद्यालयों और युवा पीढ़ी से अधिक गहराई से जोड़ा जाए। इस अवसर पर उत्तराखंड की धरती के अप्रतिम प्रकृति-कवि स्व.चंद्र कुंवर बर्त्वाल को उनकी पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। साहित्यकारों ने उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को स्मरण करते हुए कहा कि बर्त्वाल ने हिमालय,प्रकृति,मानवीय संवेदना और जीवन के सूक्ष्म अनुभवों को अपनी कविताओं में जिस आत्मीयता से अभिव्यक्त किया,वह उन्हें हिंदी साहित्य में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है। उत्तराखंड की पर्वतीय प्रकृति उनके काव्य में केवल दृश्य नहीं,बल्कि जीवंत संवेदना और आत्मिक अनुभूति के रूप में उपस्थित होती है। प्रो.उमा मैठाणी ने माध्यमिक विद्यालयों के हिंदी पाठ्यक्रम में स्थापित एवं महत्वपूर्ण हिंदी साहित्यकारों की गद्य एवं पद्य रचनाओं को समुचित स्थान दिए जाने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि यदि बच्चों को अपनी भाषा और साहित्य की श्रेष्ठ रचनाओं से प्रारंभिक स्तर पर जोड़ा जाए तो उनमें भाषा के प्रति अनुराग के साथ-साथ अपनी संस्कृति,इतिहास और सामाजिक मूल्यों के प्रति भी गहरी समझ विकसित होगी। उन्होंने कहा कि पाठ्यक्रम में स्थानीय एवं राष्ट्रीय स्तर के महत्वपूर्ण साहित्यकारों की रचनाओं को शामिल करना नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। विचार-विमर्श के पश्चात आयोजित कवि गोष्ठी ने कार्यक्रम को और अधिक साहित्यिक गरिमा प्रदान की। कवियों ने अपनी विविध भावभूमि से जुड़ी रचनाओं का काव्य पाठ कर श्रोताओं को भाव-विभोर किया। कवि गोष्ठी में प्रो.रामानंद गैरोला,डॉ.प्रकाश चमोली,जय कृष्ण पैन्यूली,माधुरी नैथानी,अनीता नोडियाल,कौशल्या नैथानी,मीनाक्षी चमोली,साइनी कृष्ण उनियाल,शम्भू प्रसाद भट्ट,पार्षद प्रवेश चमोली,सीमा मिश्रा,अनीता थपलियाल,राजेन्द्र कपरुवाण तथा नीरज नैथानी ने अपनी रचनाओं का प्रभावशाली काव्य पाठ किया। कवियों की प्रस्तुतियों में प्रकृति,समाज,मानवीय संवेदनाओं,रिश्तों,पहाड़ की संस्कृति और बदलते सामाजिक परिवेश की झलक देखने को मिली। कविताओं के माध्यम से जहां पहाड़ की पीड़ा और प्रकृति की सुंदरता को स्वर मिला,वहीं हिंदी भाषा की आत्मीयता और साहित्य की सामाजिक भूमिका भी प्रभावी रूप से सामने आई। कार्यक्रम के दौरान साहित्य और समाज के बीच संबंधों पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं,बल्कि उसके भीतर परिवर्तन की चेतना जगाने वाली शक्ति भी है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से साहित्यकारों,कलाकारों और समाज के बीच संवाद का वातावरण निर्मित होता है और युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित होने का अवसर मिलता है। इस अवसर पर संजय नौडियाल एवं अनीता नौडियाल ने अपने द्वितीय तल के नव-निर्मित भवन के उपलक्ष्य में आमंत्रित साहित्यकारों एवं अतिथियों के लिए स्नेह भोज का आयोजन किया। साहित्यिक आयोजन के साथ आत्मीय मिलन और स्नेह भोज ने कार्यक्रम को पारिवारिक एवं सौहार्दपूर्ण स्वरूप प्रदान किया। कार्यक्रम का सफल संचालन कविराज नीरज नैथानी ने किया। साहित्यकारों एवं उपस्थित अतिथियों ने हिमालयन साहित्य एवं कला परिषद् के इस आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि हिंदी दिवस जैसे अवसरों को केवल औपचारिक आयोजन तक सीमित न रखकर साहित्य,भाषा,संस्कृति और स्थानीय प्रतिभाओं को मंच देने वाले जीवंत आयोजनों के रूप में आगे बढ़ाया जाना चाहिए। समूचे आयोजन में हिंदी के प्रति सम्मान,साहित्य के प्रति अनुराग और उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने की सामूहिक भावना स्पष्ट रूप से दिखाई दी। श्रीनगर की साहित्यिक धरती पर आयोजित यह कार्यक्रम हिंदी भाषा के गौरव और स्व.चंद्र कुंवर बर्त्वाल की प्रकृति-काव्य चेतना को समर्पित एक यादगार साहित्यिक संध्या के रूप में सामने आया।