एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने जारी किया चतुर्थ मौसम एवं वायु गुणवत्ता सूचना बुलेटिन

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल के भौतिकी विभाग स्थित हिमालयी वातावरणीय एवं अंतरिक्ष भौतिकी शोध प्रयोगशाला द्वारा मई 2026 के दौरान श्रीनगर एवं आसपास के

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल के भौतिकी विभाग स्थित हिमालयी वातावरणीय एवं अंतरिक्ष भौतिकी शोध प्रयोगशाला द्वारा मई 2026 के दौरान श्रीनगर एवं आसपास के हिमालयी क्षेत्रों में मौसमीय परिवर्तनों,वायु गुणवत्ता,जंगलों की आग तथा वायुमंडलीय प्रदूषण की स्थिति को लेकर विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। यह अध्ययन वर्तमान समय में हिमालयी क्षेत्रों पर बढ़ते पर्यावरणीय दबाव और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को गंभीरता से सामने लाता है। भौतिकी विभाग बिरला परिसर श्रीनगर में आयोजित कार्यक्रम में विभागाध्यक्ष त्रिलोक चंद्र उपाध्याय ने वर्तमान मौसमीय परिवर्तन एवं वायु गुणवत्ता का चतुर्थ सूचना बुलेटिन जारी किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान केवल शैक्षणिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहने चाहिए,बल्कि समाज और पर्यावरण हित में भी उपयोगी सिद्ध होने चाहिए। उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते तापमान,जंगलों की आग और वायु प्रदूषण को गंभीर चुनौती बताते हुए इस प्रकार के शोधों को समय की आवश्यकता बताया। यह शोध कार्य डॉ.आलोक सागर गौतम एवं उनकी शोध टीम अमनदीप विश्वकर्मा,अंकित कुमार तथा सरस्वती रावत द्वारा किया गया। अध्ययन में 6 मई से 20 मई 2026 के मध्य दर्ज तापमान,वायु गुणवत्ता सूचकांक,आर्द्रता,वर्षा,जैविक दहन तथा ब्लैक कार्बन स्तरों का विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया। अध्ययन के अनुसार मई के शुरुआती दिनों में वायु गुणवत्ता सामान्य से मध्यम स्तर पर थी,लेकिन 9 मई के बाद इसमें लगातार गिरावट दर्ज की गई। 10 मई को वायु गुणवत्ता सूचकांक 215 तक पहुंच गया,जिसे खराब श्रेणी में रखा जाता है। इसके बाद 19 मई को यह सूचकांक बढ़कर 356 तक पहुंच गया,जबकि 20 मई की सुबह लगभग 10 बजे यह स्तर 390 के आसपास दर्ज किया गया, जो अत्यंत गंभीर स्थिति मानी जाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस प्रकार की वायु गुणवत्ता में वातावरण में सूक्ष्म प्रदूषक कण,धुंआ,राख तथा विषैले तत्वों की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है। इसका सीधा प्रभाव सांस संबंधी रोगों,अस्थमा,एलर्जी,आंखों में जलन तथा हृदय रोगों पर पड़ सकता है। बच्चों,बुजुर्गों और बीमार व्यक्तियों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से खतरनाक मानी गई है। तापमान में 12 डिग्री तक वृद्धि,बढ़ा हीट स्ट्रेस अध्ययन में यह भी सामने आया कि 7 मई को क्षेत्र का अधिकतम तापमान लगभग 27 डिग्री सेल्सियस था,जो 19 मई तक बढ़कर लगभग 39 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। वैज्ञानिकों ने इसे हिमालयी क्षेत्रों के लिए अत्यंत असामान्य और चिंताजनक स्थिति बताया है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते तापमान के कारण जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ सकती हैं,जल स्रोतों पर दबाव पड़ सकता है तथा स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकता है। लगातार गर्म वातावरण के कारण लोगों में गर्मी से थकान,शरीर में पानी की कमी तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा भी बढ़ गया है। जंगलों की आग और ब्लैक कार्बन बने सबसे बड़ी चिंता अध्ययन में जैविक दहन और ब्लैक कार्बन स्तरों में भी भारी वृद्धि दर्ज की गई। 9 मई को ब्लैक कार्बन का अधिकतम स्तर 8502 नैनोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया,जबकि 19 और 20 मई को इसका औसत स्तर अध्ययन अवधि में सबसे अधिक पाया गया। वैज्ञानिकों के अनुसार ब्लैक कार्बन अत्यंत सूक्ष्म कार्बन कण होते हैं,जो सूर्य की ऊष्मा को अवशोषित कर वातावरण को और अधिक गर्म बनाते हैं। हिमालयी क्षेत्रों में यह कण हिमनदों की सतह पर जमकर बर्फ पिघलने की प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं। शोधकर्ताओं ने बताया कि हाल के दिनों में जंगलों की आग,सूखी वनस्पतियों का दहन तथा स्थानीय स्तर पर हो रही जैविक जलन गतिविधियों ने क्षेत्रीय वायु गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी अध्ययन में स्पष्ट कहा गया है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में हिमालयी क्षेत्रों में जल संकट,जंगलों की आग,जैव विविधता में कमी तथा मानव स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार बदलती मौसमीय परिस्थितियां,बढ़ता तापमान,वायु प्रदूषण तथा वनाग्नि अब केवल पर्यावरणीय विषय नहीं रह गए हैं,बल्कि यह सामाजिक और स्वास्थ्य संकट का रूप लेते जा रहे हैं। वैज्ञानिकों ने आम जनता से दोपहर के समय अत्यधिक धूप में बाहर निकलने से बचने,पर्याप्त पानी पीने,सूती कपड़े पहनने तथा वायु प्रदूषण अधिक होने पर मास्क का उपयोग करने की सलाह दी है। अस्थमा एवं श्वसन रोगियों को विशेष सतर्कता बरतने,बच्चों को अत्यधिक धूल और धुएं वाले क्षेत्रों से दूर रखने तथा जंगलों की आग वाले क्षेत्रों में अनावश्यक यात्रा न करने की अपील की गई है। प्रशासन और समाज को मिलकर उठाने होंगे कदम विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि स्थानीय प्रशासन को नियमित रूप से वायु गुणवत्ता और मौसम संबंधी चेतावनी जारी करनी चाहिए। विद्यालयों,महाविद्यालयों और स्वास्थ्य संस्थानों में जन-जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता बताई गई है। इसके साथ ही वनाग्नि नियंत्रण,स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा,कृषि अवशेषों के सुरक्षित प्रबंधन तथा सतत वायु गुणवत्ता निगरानी को भविष्य की बड़ी आवश्यकता बताया गया। कार्यक्रम के दौरान विभागाध्यक्ष प्रोफेसर त्रिलोक चंद्र उपाध्याय ने डॉ.आलोक सागर गौतम एवं उनकी शोध टीम के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के वैज्ञानिक अध्ययन समाज को जागरूक करने और भविष्य की पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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