पद्मश्री प्रो.वैम्पति कुटुम्ब शास्त्री का केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय देवप्रयाग में भव्य स्वागत

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी देवप्रयाग/श्रीनगर गढ़वाल। हाल ही में पद्मश्री सम्मान से अलंकृत केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (तत्कालीन राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान) के पूर्व कुलपति एवं अंतरराष्ट्रीय संस्कृत अध्ययन संघ के अध्यक्ष प्रो.वैम्पति कुटुम्ब शास्त्री

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

देवप्रयाग/श्रीनगर गढ़वाल। हाल ही में पद्मश्री सम्मान से अलंकृत केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (तत्कालीन राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान) के पूर्व कुलपति एवं अंतरराष्ट्रीय संस्कृत अध्ययन संघ के अध्यक्ष प्रो.वैम्पति कुटुम्ब शास्त्री का केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर देवप्रयाग में भव्य स्वागत किया गया। अपने प्रथम देवप्रयाग आगमन के दौरान उन्होंने परिसर में संचालित श्री रघुनाथ कीर्ति बाल गुरुकुलम् के विद्यार्थियों के साथ आत्मीय संवाद करते हुए उन्हें जीवन में सफलता प्राप्त करने के महत्वपूर्ण सूत्र बताए। गुरुकुल के विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए प्रो. शास्त्री ने अपने छात्र जीवन की स्मृतियों को साझा करते हुए कहा कि वे स्वयं भी गुरुकुल परंपरा के ब्रह्मचारी रहे हैं। उन्होंने कहा कि 24-25 वर्ष की आयु तक किया गया परिश्रम व्यक्ति के संपूर्ण जीवन की मजबूत नींव तैयार करता है। जीवन में कोई भी स्थायी सफलता शॉर्टकट से प्राप्त नहीं होती,बल्कि निरंतर अभ्यास,धैर्य,अनुशासन और व्यापक दृष्टिकोण से ही उपलब्ध होती है। प्रो.शास्त्री ने कहा कि केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा देवप्रयाग जैसे पवित्र एवं ऐतिहासिक तीर्थस्थल पर बाल गुरुकुलम् का संचालन अत्यंत सराहनीय और दूरदर्शी पहल है। यह न केवल भारतीय ज्ञान परंपरा को सशक्त करने का कार्य कर रहा है,बल्कि संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय जैसी गौरवशाली शिक्षण परंपराओं का भी अनुकरण कर रहा है। उन्होंने कहा कि श्रीविद्या क्षेत्र में एक शताब्दी से अधिक समय से शिक्षा की परंपरा रही है और ऐसे स्थान पर आधुनिक सुविधाओं से युक्त संस्कृत परिसर एवं बाल गुरुकुलम् का होना अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धि है। प्रबोधन कार्यशाला में अपने व्याख्यान के दौरान उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत की ज्ञान ग्रहण करने की परंपरा मूलतः श्रुति आधारित रही है। हमारे पूर्वज सुनकर ज्ञान को आत्मसात करते थे और वर्षों तक उसे अपने मन-मस्तिष्क में सुरक्षित रखने की क्षमता रखते थे। उन्होंने कहा कि जीवन में अर्जित प्रत्येक ज्ञान का बोध तत्काल नहीं होता,बल्कि समय के साथ उसकी गहराई और महत्ता समझ में आती है। भारतीय शास्त्र परंपरा में कभी भी लघुता या त्वरित सफलता को महत्व नहीं दिया गया। यहां प्रत्येक उपलब्धि के पीछे समय,साधना,विस्तार और एक निश्चित प्रक्रिया का योगदान होता है। उन्होंने संस्कृत शिक्षा के बढ़ते दायरे पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि संस्कृत अध्ययन में बालकों के साथ-साथ बड़ी संख्या में बालिकाओं की सक्रिय भागीदारी संस्कृत भाषा और भारतीय संस्कृति के उज्ज्वल भविष्य का संकेत है। उन्होंने कहा कि जब विद्यार्थी प्रसन्न मन,श्रद्धा और रुचि के साथ ज्ञान अर्जित करते हैं,तब वह ज्ञान स्थायी रूप से उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है। प्रो.शास्त्री ने परिसर में बाल गुरुकुलम् और समुत्कर्ष केंद्र की स्थापना के लिए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.श्रीनिवास वरखेड़ी का आभार व्यक्त किया तथा परिसर के निदेशक प्रो.पी.वी.बी.सुब्रह्मण्यम के नेतृत्व में हो रहे उत्कृष्ट शैक्षणिक एवं प्रशासनिक कार्यों की सराहना की। उन्होंने कहा कि संस्कृतमय भारत के निर्माण के लिए देशभर में ऐसे शिक्षण परिसरों और विश्वविद्यालयों की अत्यंत आवश्यकता है। पद्मश्री सम्मान प्राप्ति के पश्चात पहली बार परिसर पहुंचे प्रो.कुटुम्ब शास्त्री का निदेशक प्रो.पी.वी.बी.सुब्रह्मण्यम,सह-निदेशिका प्रो.चंद्रकला आर.कोंडी तथा डॉ.शैलेन्द्र नारायण कोटियाल ने पुष्पगुच्छ एवं स्मृति चिह्न भेंट कर अभिनंदन किया। उन्होंने परिसर की स्थापना के दस वर्षों में हुई उल्लेखनीय प्रगति तथा अध्ययन-अध्यापन की गुणवत्ता पर संतोष व्यक्त किया। इस अवसर पर उन्होंने पूरे परिसर का भ्रमण कर विभिन्न शैक्षणिक गतिविधियों की जानकारी भी प्राप्त की। कार्यक्रम में डॉ.अनिल कुमार, डॉ.गणेश्वरनाथ झा,डॉ.सुधांशु वर्मा,डॉ.अरविंद सिंह गौर,डॉ.सुमिति सैनी,डॉ.सोमेश बहुगुणा,डॉ.रवींद्र उनियाल,डॉ.सुरेश शर्मा,पंकज कोटियाल,अंकुर वत्स सहित विश्वविद्यालय परिवार के अनेक सदस्य उपस्थित रहे।

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