पहाड़ के लिए धड़का डॉक्टर का दिल-उत्तराखंड लौटकर ह्रदय रोगियों की सेवा को बढ़ाया हाथ

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी रुद्रप्रयाग/अगस्त्यमुनि/श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षों से विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी के कारण गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए एक उम्मीद की किरण दिखाई दी

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

रुद्रप्रयाग/अगस्त्यमुनि/श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षों से विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी के कारण गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए एक उम्मीद की किरण दिखाई दी है। जनपद रुद्रप्रयाग के अगस्त्यमुनि विकासखंड अंतर्गत सिल्ला गांव के प्रतिभाशाली युवा हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ.हितेश नौटियाल ने अपने गृह राज्य उत्तराखंड लौटकर यहां के लोगों को अत्याधुनिक हृदय रोग सेवाएं देने की प्रबल इच्छा व्यक्त की है। इसके लिए उन्होंने उत्तराखंड के स्वास्थ्य मंत्री को विस्तृत पत्र लिखकर यू कोट वी पे योजना के अंतर्गत सुपर स्पेशलिस्ट नॉन-इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में सेवाएं देने का अनुरोध किया है। डॉ.हितेश नौटियाल का यह कदम केवल एक नियुक्ति का अनुरोध नहीं,बल्कि अपने पहाड़,अपनी मातृभूमि और यहां के लोगों के प्रति समर्पण,संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रेरक उदाहरण बनकर सामने आया है। ऐसे समय में जब अधिकांश विशेषज्ञ चिकित्सक महानगरों में करियर बनाना पसंद करते हैं,वहीं उत्तराखंड का यह युवा चिकित्सक पहाड़ के दुर्गम क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के संकल्प के साथ आगे आया है। डॉ.हितेश नौटियाल रुद्रप्रयाग जनपद के सिल्ला गांव निवासी रमेश प्रसाद नौटियाल एवं मीनाक्षी नौटियाल के पुत्र हैं। उन्होंने दून मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस तथा एमडी की शिक्षा प्राप्त करने के बाद देश के प्रतिष्ठित अस्पतालों में अपनी विशेषज्ञ सेवाएं दी हैं। वर्तमान में वे पिछले लगभग तीन वर्षों से गुरुग्राम स्थित देश के अग्रणी हृदय संस्थानों में से एक मेदांता-द मेडिसिटी के हार्ट इंस्टीट्यूट में क्लीनिकल एवं प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी विभाग में अटेंडिंग कंसल्टेंट के रूप में कार्यरत हैं। इससे पूर्व उन्होंने फेलोशिप इन क्लीनिकल एंड प्रिवेंटिव नॉन-इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी भी पूर्ण की है। स्वास्थ्य मंत्री को भेजे गए अपने विस्तृत पत्र में डॉ.नौटियाल ने स्पष्ट किया है कि उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में आज भी विशेषज्ञ कार्डियोलॉजी सेवाओं का गंभीर अभाव है। हृदय रोगियों को उपचार के लिए देहरादून,दिल्ली अथवा अन्य महानगरों तक लंबी दूरी तय करनी पड़ती है,जिससे समय,धन और कई बार मरीज की जान तक जोखिम में पड़ जाती है। उन्होंने लिखा है कि यदि पर्वतीय क्षेत्रों में समय पर ईकोकार्डियोग्राफी,क्लीनिकल कार्डियोलॉजी एवं प्रारंभिक हृदय जांच की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं तो हजारों मरीजों को समय रहते बेहतर उपचार मिल सकता है। अपने पत्र में उन्होंने यह भी उल्लेख किया है कि उन्होंने अब तक पांच हजार से अधिक उन्नत ईकोकार्डियोग्राफी परीक्षणों का संचालन एवं विश्लेषण किया है। उन्हें हार्ट फेल्योर,कार्डियोमायोपैथी,वाल्वुलर हार्ट डिजीज,एरिदमिया,पल्मोनरी हाइपरटेंशन तथा गंभीर हृदय रोगों के निदान और उपचार का व्यापक अनुभव प्राप्त है। डॉ.नौटियाल ने विशेष रूप से श्रीनगर गढ़वाल स्थित बेस अस्पताल में विकसित हो रही कैथ लैब सेवाओं के साथ मिलकर एक व्यापक कार्डियोलॉजी केयर सिस्टम विकसित करने की इच्छा भी व्यक्त की है। उनका मानना है कि यदि पर्वतीय क्षेत्रों में विशेषज्ञ हृदय चिकित्सा,ईकोकार्डियोग्राफी तथा रेफरल व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाए तो उत्तराखंड में हृदय रोगों से होने वाली मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। उन्होंने अपने पत्र में कहा है कि उत्तराखंड उनका गृह राज्य है और यहां की भौगोलिक परिस्थितियों,स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों तथा आम लोगों की कठिनाइयों से वे भली-भांति परिचित हैं। इसलिए वे अपने अनुभव और विशेषज्ञता का लाभ उत्तराखंड की जनता को देना चाहते हैं। डॉ.हितेश नौटियाल की यह पहल न केवल उत्तराखंड के स्वास्थ्य तंत्र के लिए सकारात्मक संदेश है,बल्कि उन सभी युवा विशेषज्ञ चिकित्सकों के लिए भी प्रेरणा है जो देश-विदेश के बड़े अस्पतालों में कार्यरत हैं। यदि ऐसे विशेषज्ञ अपने राज्य की ओर लौटकर सेवाएं दें तो पर्वतीय क्षेत्रों की स्वास्थ्य व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव संभव है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में जहां आज भी सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की भारी कमी है,वहां डॉ.हितेश नौटियाल जैसे युवाओं का अपने प्रदेश लौटने का संकल्प निश्चित रूप से स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा देने वाला कदम माना जा रहा है। यदि सरकार उनकी इस पहल को सकारात्मक रूप से स्वीकार करती है तो भविष्य में अनेक अन्य विशेषज्ञ चिकित्सक भी अपने पहाड़ लौटकर सेवा देने के लिए प्रेरित हो सकते हैं। यह केवल एक डॉक्टर की वापसी की इच्छा नहीं,बल्कि अपने पहाड़ के प्रति कर्तव्य,संवेदना और समर्पण का ऐसा संदेश है जो उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था में नई उम्मीद जगा सकता है।

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