
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय में आयोजित सात दिवसीय संस्कृत सप्ताह महोत्सव-2026 के अंतर्गत गुरुवार 3 सितम्बर को तृतीय दिवस का कार्यक्रम ज्ञान,संस्कृति,साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्ध विरासत को समर्पित रहा। विश्वविद्यालय परिसर में संस्कृत भाषा की मधुर गूंज के बीच आयोजित कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन करते हुए संस्कृत की जीवंतता और उसकी वर्तमान प्रासंगिकता का प्रभावी संदेश दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथियों द्वारा विधिवत दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इसके उपरांत वैदिक एवं लौकिक मंगलाचरण ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक एवं संस्कृतमय बना दिया। विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत सुमधुर संस्कृत गीतिका ने कार्यक्रम में चार चांद लगा दिए। उपस्थित अतिथियों,शिक्षकों एवं विद्यार्थियों ने संस्कृत की भावपूर्ण प्रस्तुतियों का उत्साहपूर्वक आनंद लिया। कार्यक्रम के प्रारंभ में डॉ.विश्वेश वाग्मी ने स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों का अभिनंदन किया। उन्होंने संस्कृत सप्ताह महोत्सव के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए संस्कृत भाषा को भारतीय संस्कृति,ज्ञान-विज्ञान,दर्शन एवं साहित्य की अमूल्य धरोहर बताया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता शिक्षाशास्त्र विभाग के डॉ.अमरजीत सिंह रहे। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास में संस्कृत भाषा के अतुलनीय योगदान पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं,बल्कि भारत की ज्ञान-संपदा,दर्शन,साहित्य,विज्ञान,अध्यात्म और सांस्कृतिक चेतना को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने वाली सशक्त भाषा है। आधुनिक समय में भी संस्कृत की उपयोगिता और प्रासंगिकता निरंतर बनी हुई है। उन्होंने विद्यार्थियों का आह्वान किया कि संस्कृत को केवल अध्ययन का विषय न मानकर भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने और उससे जुड़ने के माध्यम के रूप में अपनाया जाए। कार्यक्रम की अध्यक्षता हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो.मज्जुला राणा ने की। उन्होंने संस्कृत को भारतीय भाषायी एवं सांस्कृतिक परंपरा की आधारभूत भाषा बताते हुए कहा कि संस्कृत ने भारतीय साहित्य,दर्शन और ज्ञान-विज्ञान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संस्कृत की समृद्ध परंपरा ने भारतीय समाज को वैचारिक,नैतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध करने का कार्य किया है। उन्होंने कहा कि संस्कृत के संरक्षण और संवर्धन की जिम्मेदारी केवल संस्कृत विभाग या संस्कृत के विद्यार्थियों की नहीं,बल्कि प्रत्येक भारतीय की साझा जिम्मेदारी है। महोत्सव के तृतीय दिवस का सबसे आकर्षक पक्ष विद्यार्थियों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां रहीं। विद्यार्थियों ने एकल गीत,अजाविक्रयणम् नाटक का जीवंत मंचन तथा नीति और जीवन-मूल्यों से प्रेरित सुभाषित श्लोकों का सस्वर पाठ प्रस्तुत किया। अजाविक्रयणम् नाटक के मंचन में विद्यार्थियों ने अपने अभिनय कौशल का प्रभावी प्रदर्शन किया। संवाद,भाव-भंगिमा और मंचीय प्रस्तुति के माध्यम से विद्यार्थियों ने संस्कृत नाट्य परंपरा की जीवंत झलक प्रस्तुत की। वहीं सुभाषित श्लोकों के सस्वर पाठ ने कार्यक्रम में नैतिकता,सदाचार और जीवन-मूल्यों का संदेश प्रभावशाली ढंग से पहुंचाया। कार्यक्रम का मंच संचालन डॉ.प्रीति ने कुशलतापूर्वक किया। उन्होंने कार्यक्रम की प्रत्येक कड़ी को सहज एवं प्रभावशाली ढंग से आगे बढ़ाया। अंत में डॉ.बालकृष्ण बंधानी ने सभी अतिथियों,वक्ताओं,शिक्षकों,विद्यार्थियों एवं आयोजन से जुड़े सहयोगियों का आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का समापन ध्येयमंत्र एवं शांतिपाठ के साथ हुआ। संस्कृत सप्ताह महोत्सव के तृतीय दिवस ने यह संदेश स्पष्ट किया कि संस्कृत केवल अतीत की भाषा नहीं,बल्कि भारतीय ज्ञान,संस्कृति और जीवन-दर्शन से जुड़ी ऐसी जीवंत धरोहर है,जिसकी प्रासंगिकता वर्तमान समय में भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। विश्वविद्यालय में आयोजित यह महोत्सव विद्यार्थियों को संस्कृत भाषा के साथ जोड़ने के साथ-साथ भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और ज्ञान परंपरा के प्रति नई चेतना जागृत करने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है।