
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के अवसर पर हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के बेस अस्पताल श्रीनगर के मनोचिकित्सा विभाग की ओर से जागरूकता एवं शपथ कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य,भावनात्मक परेशानियों और आत्महत्या जैसे गंभीर विषयों पर समाज में खुलकर संवाद बढ़ाने तथा मानसिक रूप से परेशान व्यक्ति की बात संवेदनशीलता के साथ सुनने का संदेश दिया गया। कार्यक्रम में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि किसी व्यक्ति की मानसिक पीड़ा हमेशा उसके चेहरे या व्यवहार से दिखाई नहीं देती। ऐसे में समय रहते उसकी चुप्पी को समझना,उससे संवाद करना और आवश्यकता पड़ने पर उचित सहायता तक पहुंचाना बेहद महत्वपूर्ण है। कार्यक्रम की शुरुआत खाली कुर्सी गतिविधि के माध्यम से की गई। कार्यक्रम स्थल पर रखी गई खाली कुर्सी ऐसे व्यक्ति का प्रतीक थी,जो हमारे आसपास रहते हुए भी अपनी पीड़ा और परेशानियों को किसी के साथ साझा नहीं कर पा रहा है। कुछ क्षणों के मौन के बाद प्रतिभागियों को समझाया गया कि मानसिक संघर्ष अक्सर भीतर ही भीतर चलता रहता है और कई बार व्यक्ति अपनी परेशानी व्यक्त नहीं कर पाता। ऐसे में किसी व्यक्ति से सहजता से यह पूछ लेना कि आप ठीक हैं,मैं आपकी बात सुन सकता हूं। उसके जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव की शुरुआत बन सकता है। कार्यक्रम में अनाम पर्चियों के माध्यम से भी भावनात्मक जुड़ाव और सहयोग का संदेश दिया गया। प्रतिभागियों ने अगर कभी तुम बहुत टूटे हुए महसूस करो,तो मैं वाक्य को पूरा करते हुए किसी परेशान व्यक्ति की बात सुनने,उसके साथ खड़े रहने तथा आवश्यकता पड़ने पर उसे उचित सहायता उपलब्ध कराने का संकल्प व्यक्त किया। इस गतिविधि ने यह संदेश दिया कि कठिन समय में व्यक्ति को सबसे पहले किसी ऐसे सहारे की जरूरत होती है,जहां वह बिना किसी डर,संकोच अथवा पूर्वाग्रह के अपनी बात कह सके। कार्यक्रम की विशेष गतिविधि जीने के 100 कारण रही। इस दौरान प्रतिभागियों एवं मरीजों ने जीवन से जुड़े छोटे-बड़े कारण साझा किए। किसी ने माता-पिता और बच्चों का साथ,किसी ने अपनों की मुस्कान,किसी ने दोस्ती,अधूरे सपने,घर लौटने की इच्छा,पहाड़ों की शांत सुबह,पसंदीदा संगीत,किसी अपने से दोबारा मिलने की उम्मीद तो किसी ने आने वाले कल और नई शुरुआत को जीवन का कारण बताया। इस गतिविधि के माध्यम से बेहद संवेदनशील संदेश दिया गया कि जब इंसान गहरी मानसिक परेशानी से गुजरता है,तब जीवन के बड़े उद्देश्य कई बार धुंधले पड़ जाते हैं। ऐसे समय में कोई छोटा-सा रिश्ता,किसी अपने की मुस्कान,अधूरा सपना,प्रकृति का कोई सुंदर दृश्य अथवा आने वाले कल की छोटी-सी उम्मीद भी व्यक्ति को आगे बढ़ने की ताकत दे सकती है। इसलिए जीवन की कठिन परिस्थितियों में व्यक्ति को अकेला छोड़ने के बजाय उसके साथ संवाद और सहयोग का वातावरण तैयार करना आवश्यक है। कार्यक्रम के दौरान सामूहिक आत्महत्या रोकथाम शपथ भी दिलाई गई। इसमें प्रतिभागियों ने प्रत्येक जीवन को महत्वपूर्ण मानने,मानसिक परेशानी और आत्महत्या से जुड़ी बातों को गंभीरता से लेने,परेशान व्यक्ति की बात बिना किसी पूर्वाग्रह के सुनने,जरूरत पड़ने पर स्वयं सहायता लेने तथा जरूरतमंद व्यक्ति को उचित सहायता तक पहुंचाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम का सामूहिक संदेश रहा मैं सुनूंगा,मैं पूछूंगा,मैं साथ रहूंगा। इस संदेश के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया कि आत्महत्या रोकथाम केवल चिकित्सकों अथवा मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की जिम्मेदारी नहीं है,बल्कि परिवार,मित्र,सहकर्मी,शिक्षक और समाज का प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। कार्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए टेली-मानस हेल्पलाइन 14416 की जानकारी भी साझा की गई। उपस्थित लोगों को बताया गया कि मानसिक परेशानी को छिपाने या अकेले सहने के बजाय समय रहते सहायता लेना कमजोरी नहीं,बल्कि स्वयं के जीवन और भविष्य के प्रति जिम्मेदारी है। कार्यक्रम के समापन पर वक्ताओं ने कहा कि आत्महत्या रोकथाम दिवस की शपथ की वास्तविक सार्थकता केवल शब्दों को दोहराने में नहीं,बल्कि किसी परेशान व्यक्ति की चुप्पी को पहचानने और कठिन समय में उसके साथ खड़े होने में है। कई बार किसी व्यक्ति को समाधान से पहले केवल एक संवेदनशील श्रोता की आवश्यकता होती है। इसलिए परिवार और समाज में ऐसा वातावरण बनाया जाना जरूरी है,जहां व्यक्ति बिना झिझक अपनी परेशानी साझा कर सके और उसे समय पर भावनात्मक एवं चिकित्सकीय सहायता मिल सके। इस अवसर पर चिकित्सा अधीक्षक डॉ.ए.एन.पांडे,मनोचिकित्सा विभागाध्यक्ष डॉ.मोहित कुमार,असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ.पार्थ दत्ता एवं डॉ.मोहित सैनी,सीनियर रेजिडेंट,जूनियर रेजिडेंट,अस्पताल के कर्मचारी,चिकित्सा विद्यार्थी एवं मरीज उपस्थित रहे।