पिरुल से संवर रही बंदियों की नई जिंदगी,हुनर के सहारे आत्मनिर्भरता की ओर बढ़े कदम

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी पौड़ी/श्रीनगर गढ़वाल। कभी जंगलों की जमीन पर बिखरी पिरुल की सूखी पत्तियां आग का कारण बनकर पर्यावरण और वन संपदा के लिए चुनौती पैदा करती थीं,लेकिन अब यही पिरुल

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

पौड़ी/श्रीनगर गढ़वाल। कभी जंगलों की जमीन पर बिखरी पिरुल की सूखी पत्तियां आग का कारण बनकर पर्यावरण और वन संपदा के लिए चुनौती पैदा करती थीं,लेकिन अब यही पिरुल कुछ लोगों के जीवन में नई उम्मीद,हुनर और आत्मनिर्भरता की कहानी लिख रहा है। पौड़ी जिला कारागार के बंदियों ने पिरुल की इन्हीं पत्तियों को अपनी रचनात्मकता का आधार बनाकर रोजगार की संभावनाओं की ओर कदम बढ़ाया है। जेल की चारदीवारी के भीतर अब पिरुल से सुंदर और आकर्षक हस्तशिल्प एवं सजावटी उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की एक जेल,एक उत्पाद पहल के तहत जनपद पौड़ी में जिला कारागार के बंदियों को स्थानीय संसाधनों पर आधारित हुनर से जोड़ने की दिशा में यह पहल की गई है। जिलाधिकारी स्वाति एस.भदौरिया के निर्देशन में जिला कारागार में बंदियों को पिरुल आधारित हस्तशिल्प निर्माण का 21 दिवसीय प्रशिक्षण प्रदान किया गया। प्रशिक्षण पूर्ण करने के बाद बंदी अब सीखे गए हुनर को व्यवहार में उतारते हुए विभिन्न उपयोगी एवं सजावटी उत्पाद तैयार कर रहे हैं। जिला उद्योग केंद्र के माध्यम से आयोजित प्रशिक्षण में बंदियों को पिरुल की पत्तियों को एकत्र करने,उन्हें आवश्यक रूप से तैयार एवं प्रसंस्कृत करने तथा उनसे विभिन्न प्रकार के हस्तशिल्प उत्पाद बनाने की बारीकियां सिखाई गईं। प्रशिक्षण के दौरान बंदियों ने पिरुल की पत्तियों को आकर्षक स्वरूप देने,उन्हें आकार प्रदान करने तथा घरेलू सजावट में उपयोग होने वाली वस्तुओं के निर्माण की तकनीक सीखी। अब प्रशिक्षण के बाद बंदी स्वयं इन उत्पादों को तैयार कर रहे हैं। पिरुल से तैयार होने वाली वस्तुओं में उनकी रचनात्मकता और मेहनत साफ दिखाई दे रही है। इससे जहां स्थानीय प्राकृतिक संसाधन का उपयोग हो रहा है,वहीं बंदियों को अपने हाथों से कुछ नया और उपयोगी बनाने का आत्मविश्वास भी मिल रहा है। जिला कारागार अधीक्षक कौशल सिंह ने बताया कि एक जेल,एक उत्पाद पहल का मुख्य उद्देश्य बंदियों को केवल कारागार अवधि तक सीमित न रखते हुए उन्हें ऐसे व्यावहारिक कौशल से जोड़ना है,जो भविष्य में उनके लिए आजीविका का आधार बन सके। प्रशिक्षण के माध्यम से बंदियों को पिरुल से हस्तशिल्प उत्पाद तैयार करने की तकनीकी जानकारी और व्यावहारिक अनुभव दिया गया है। उन्होंने कहा कि बंदियों के भीतर मौजूद प्रतिभा और रचनात्मकता को सकारात्मक दिशा देना इस पहल का महत्वपूर्ण उद्देश्य है। सजा पूरी होने के बाद जब ये बंदी समाज की मुख्यधारा में लौटें,तो उनके पास कोई उपयोगी हुनर हो,जिसके माध्यम से वे स्वरोजगार अथवा रोजगार की दिशा में आगे बढ़ सकें। उत्तराखंड के जंगलों में बड़ी मात्रा में मिलने वाला पिरुल लंबे समय से वनाग्नि के प्रमुख कारणों में शामिल रहा है। ऐसे में पिरुल का उपयोग हस्तशिल्प निर्माण के लिए किया जाना पर्यावरणीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अनुपयोगी समझी जाने वाली पत्तियों को उपयोगी उत्पादों में बदलकर न केवल स्थानीय संसाधन का बेहतर उपयोग किया जा रहा है,बल्कि कौशल विकास की नई संभावनाएं भी तैयार हो रही हैं। जिला कारागार में चल रही यह पहल इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि बंदियों को उनके भीतर छिपी रचनात्मक क्षमता को पहचानने और उसे सकारात्मक कार्य में लगाने का अवसर मिल रहा है। पिरुल की साधारण पत्तियां उनके लिए अब केवल जंगल का अवशेष नहीं,बल्कि हुनर,आत्मविश्वास और भविष्य की नई संभावनाओं का माध्यम बन रही हैं। कारागार में कौशल विकास से जुड़ी ऐसी गतिविधियां बंदियों के पुनर्वास और सामाजिक पुनर्स्थापन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। हस्तशिल्प निर्माण के दौरान बंदियों को मेहनत,धैर्य,अनुशासन और रचनात्मकता के साथ काम करने का अवसर मिल रहा है। इससे उनके भीतर सकारात्मक सोच विकसित होने के साथ भविष्य में अपने पैरों पर खड़े होने की उम्मीद भी मजबूत हो रही है। पौड़ी जिला कारागार में पिरुल से तैयार किए जा रहे उत्पाद इस बात का संदेश दे रहे हैं कि यदि स्थानीय संसाधनों और मानवीय हुनर को सही दिशा और अवसर मिले,तो कठिन परिस्थितियों के बीच भी नई राह और नई शुरुआत संभव है। एक जेल,एक उत्पाद पहल के माध्यम से बंदियों के हाथों में हुनर देकर उन्हें आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ाने का यह प्रयास सामाजिक पुनर्वास की दिशा में एक सार्थक पहल के रूप में सामने आ रहा है।

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