
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला रक्षाबंधन भारतीय सनातन संस्कृति का ऐसा अनुपम पर्व है,जिसमें एक साधारण-सा दिखाई देने वाला रक्षा-सूत्र प्रेम,विश्वास,आत्मीयता,जिम्मेदारी और जीवनभर एक-दूसरे के साथ खड़े रहने के संकल्प का प्रतीक बन जाता है। यह पर्व केवल भाई की कलाई पर राखी बांधने और बहन को उपहार देने तक सीमित नहीं है,बल्कि भारतीय पारिवारिक व्यवस्था में निहित त्याग,समर्पण,मर्यादा और पारस्परिक सम्मान की गहरी भावना को अभिव्यक्त करता है। इस वर्ष रक्षाबंधन का पावन पर्व 28 अगस्त 2026 शुक्रवार को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार इस दिन पूर्णिमा तिथि प्रातः तक रहेगी और उपलब्ध पंचांग संदर्भ में भद्रा सूर्योदय से पहले ही समाप्त बताई गई है। रक्षाबंधन का वास्तविक अर्थ केवल इतना नहीं कि बहन भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधे और भाई उसकी रक्षा का वचन दे। इसके पीछे एक व्यापक सामाजिक दर्शन भी निहित है-एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी बनना,परिवार की एकता को मजबूत करना और रिश्तों में विश्वास तथा संवेदनशीलता को जीवित रखना। रक्षा-विधान के समय परंपरागत रूप से इस पवित्र मंत्र का उच्चारण किया जाता है-येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥ अर्थात जिस रक्षा-सूत्र से अत्यंत शक्तिशाली दानवराज बलि को बांधा गया था,उसी रक्षा-सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं। हे रक्षा-सूत्र! तुम सदैव स्थिर रहो और अपने कर्तव्य से कभी विचलित मत हो। यह मंत्र इस बात का प्रतीक है कि रक्षा केवल शारीरिक सुरक्षा का नाम नहीं है। रक्षा का अर्थ है-सम्मान की रक्षा,संस्कारों की रक्षा,रिश्तों की रक्षा और एक-दूसरे के विश्वास की रक्षा। रक्षाबंधन की परंपरा भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक स्मृतियों में अनेक प्रेरणादायी प्रसंगों से जुड़ी हुई है। भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग भाई-बहन के स्नेह और संरक्षण की भावना को अत्यंत मार्मिक रूप में प्रस्तुत करता है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण की उंगली से रक्त निकलने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का कपड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया था। इसी आत्मीयता को श्रीकृष्ण ने संकट की घड़ी में द्रौपदी की मर्यादा की रक्षा के रूप में स्मरण किया। इसी प्रकार भविष्य पुराण से जुड़ी मान्यता में इंद्राणी द्वारा देवराज इंद्र की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधने का उल्लेख मिलता है। यह प्रसंग रक्षा-सूत्र को संकट से रक्षा और विजय के संकल्प से जोड़ता है। इतिहास में रानी कर्णावती और हुमायूं से जुड़ा प्रसंग भी रक्षाबंधन की व्यापक सामाजिक कल्पना को रेखांकित करता है। हालांकि इस प्रसंग के ऐतिहासिक विवरणों को लेकर इतिहासकारों में मतभेद भी रहे हैं,फिर भी लोक-स्मृति में यह कथा राखी के माध्यम से स्थापित मानवीय संबंध और सहायता की भावना का उदाहरण बन चुकी है। भद्रा से बचकर शुभ समय में रक्षा-सूत्र बांधने की परंपरा
धार्मिक परंपराओं में रक्षाबंधन के अवसर पर भद्रा काल में रक्षा-सूत्र बांधने से बचने की मान्यता रही है। शास्त्रीय परंपरा में भद्रा को मांगलिक कार्यों के लिए अनुपयुक्त माना गया है। इसलिए परिवारों में राखी बांधने से पूर्व पंचांग के अनुसार शुभ समय देखने की परंपरा आज भी कायम है। उपलब्ध पंचांग विवरण के अनुसार वर्ष 2026 में उत्तराखंड के प्रमुख स्थानों के लिए रक्षाबंधन 28 अगस्त को है और भद्रा सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाती है। पूजा की थाली से लेकर आशीर्वाद तक,हर चरण में छिपा है भाव रक्षाबंधन पर बहन पूजा की थाली में रोली,अक्षत,दीपक,मिष्ठान और रक्षा-सूत्र सजाती है। भाई को शुभ आसन पर बैठाकर तिलक किया जाता है,आरती उतारी जाती है और उसकी कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा जाता है। इसके बाद भाई-बहन एक-दूसरे के सुखी,स्वस्थ और समृद्ध जीवन की कामना करते हैं। राखी बांधने के बाद भाई द्वारा बहन को उपहार देना केवल परंपरा नहीं,बल्कि उसके प्रति सम्मान और स्नेह की अभिव्यक्ति है। वहीं बहन की प्रार्थना केवल भाई की लंबी आयु तक सीमित नहीं रहती,बल्कि वह उसके उज्ज्वल भविष्य,सद्बुद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करती है। इस प्रकार रक्षाबंधन का हर अनुष्ठान अपने भीतर एक संदेश समेटे हुए है-रिश्ते अधिकार से नहीं,विश्वास और जिम्मेदारी से मजबूत होते हैं। आधुनिक समय में रक्षाबंधन की परिभाषा पारंपरिक भाई-बहन के रिश्ते से आगे बढ़कर सामाजिक सरोकारों से जुड़ रही है। आज बहन की सुरक्षा का अर्थ केवल उसकी शारीरिक सुरक्षा नहीं,बल्कि उसके सम्मान,शिक्षा,स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा भी है। इसी प्रकार समाज में सैनिकों,पुलिसकर्मियों,चिकित्सकों,पर्यावरण कार्यकर्ताओं और अन्य ऐसे लोगों को राखी बांधने की परंपरा भी बढ़ रही है,जो समाज की सुरक्षा और सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सीमाओं पर तैनात जवानों को राखी भेजना देश की बहनों की ओर से राष्ट्ररक्षा में लगे वीरों के प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट करता है। कई स्थानों पर रक्षाबंधन को वृक्ष-रक्षा और पर्यावरण संरक्षण से भी जोड़ा जा रहा है। पेड़ों को रक्षा-सूत्र बांधकर उनके संरक्षण का संकल्प लेना इस पर्व को प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन का संदेश देने वाला पर्व बना रहा है। आज का जीवन भागदौड़,व्यस्तता और तकनीक से घिरा हुआ है। परिवार के सदस्य कई बार एक ही शहर में रहते हुए भी एक-दूसरे के लिए पर्याप्त समय नहीं निकाल पाते। ऐसे दौर में रक्षाबंधन केवल एक त्योहार नहीं,बल्कि रिश्तों को फिर से आत्मीयता के धागे में पिरोने का अवसर बनकर सामने आता है। राखी की एक छोटी-सी डोर भाई-बहन को यह स्मरण कराती है कि जीवन में चाहे कितनी भी व्यस्तता क्यों न हो,परिवार और अपने लोगों के प्रति जिम्मेदारी कभी समाप्त नहीं होती। डॉ.अखिलेश चन्द्र चमोला के अनुसार रक्षाबंधन का सबसे बड़ा संदेश यही है कि समाज में सुरक्षा,सम्मान,सहयोग और संवेदनशीलता की भावना मजबूत हो। यदि हम रक्षा-सूत्र के वास्तविक अर्थ को समझें तो यह पर्व केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे के प्रति अपने कर्तव्य का बोध कराएगा। रक्षाबंधन हमें सिखाता है कि प्रेम में अधिकार से अधिक जिम्मेदारी,रिश्तों में अपेक्षा से अधिक विश्वास और जीवन में स्वार्थ से अधिक त्याग का महत्व है। आज आवश्यकता इस बात की है कि रक्षाबंधन के पवित्र अवसर पर हम केवल राखी बांधने की रस्म पूरी न करें,बल्कि उसके पीछे छिपे मूल भाव को भी अपने जीवन में उतारें। बहनों के सम्मान,बेटियों की सुरक्षा,परिवार की एकता,प्रकृति की रक्षा और समाज में परस्पर सहयोग का संकल्प ही इस पर्व की सार्थकता को वास्तविक अर्थ प्रदान कर सकता है। रक्षाबंधन की डोर छोटी अवश्य है,लेकिन इसका संदेश अत्यंत व्यापक है। यह डोर भाई-बहन के हाथों से निकलकर परिवार,समाज और संपूर्ण मानवता को स्नेह,विश्वास,कर्तव्य और संरक्षण के एक मजबूत सूत्र में बांधने की क्षमता रखती है।