
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। पहाड़ों की आर्थिकी की रीढ़ मानी जाने वाली सेब की खेती इन दिनों अपने सबसे महत्वपूर्ण चरण फूल अवस्था (पुष्पन काल) में प्रवेश कर चुकी है। यह वह संवेदनशील समय होता है,जब परागण,फल बनने की प्रक्रिया (फल सेट) और प्रारंभिक फल विकास जैसे महत्वपूर्ण कार्य संपन्न होते हैं। यही चरण आगे चलकर फसल की मात्रा,फल का आकार,गुणवत्ता और बाजार में उसकी कीमत तय करता है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि इस समय थोड़ी सी भी लापरवाही बरती जाए या प्राकृतिक परिस्थितियां अनुकूल न रहें,तो उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है। वर्तमान में बदलते मौसम-कम तापमान,लगातार वर्षा,बादलों की अधिकता और परागण करने वाले कीटों विशेषकर मधुमक्खियों की घटती सक्रियता के चलते प्राकृतिक परागण प्रभावित हो रहा है। ऐसे में कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को हाथ से परागण (हैंड पॉलिनेशन) हाथ से परागण वह प्रक्रिया है,जिसमें पौधों के फूलों में पराग का स्थानांतरण मनुष्य द्वारा किया जाता है। सामान्यतः यह कार्य मधुमक्खियों,तितलियों,हवा या अन्य कीटों के माध्यम से स्वाभाविक रूप से होता है,लेकिन प्रतिकूल परिस्थितियों में जब यह प्रक्रिया बाधित हो जाती है,तब हाथ से परागण एक कारगर विकल्प बनकर सामने आता है। विशेषज्ञ डॉ.राजेंद्र कुकसाल के अनुसार हाथ से परागण के लिए संगत परागणकर्ता किस्मों का चयन सफलता की कुंजी है। इसके लिए गोल्डन डिलीशियस,रेड गोल्डन,ग्रैनी स्मिथ,चैलेंजर और मंचूरियन जैसी किस्में उपयुक्त मानी जाती हैं,जो परागण प्रक्रिया को प्रभावी बनाती हैं। पराग संग्रह के लिए चयनित किस्मों के फूलों से गुब्बारा अवस्था (बैलून स्टेज) में परागकोष (एन्थर) को सावधानीपूर्वक अलग किया जाता है। इन्हें स्वच्छ और छायादार स्थान पर 20 से 25 डिग्री तापमान में 24 से 48 घंटे तक रखा जाता है। सूखने के बाद पराग स्वतः निकल आता है,जिसे छानकर साफ कर लिया जाता है। जरूरत पड़ने पर इस पराग को ठंडे और सूखे स्थान,जैसे रेफ्रिजरेटर में कांच के जार में सुरक्षित रखा जा सकता है। परागण का सबसे उपयुक्त समय पूर्ण पुष्पन अवस्था (फुल ब्लूम) में सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे तक माना गया है। इस दौरान फूल का वर्तिकाग्र (स्टिग्मा) चिपचिपा होता है और पराग को आसानी से ग्रहण कर लेता है। परागण के लिए मुलायम ब्रश या रूई की कली (कॉटन स्वैब) का उपयोग किया जाता है। बेहतर परिणाम के लिए इस प्रक्रिया को 1 से 2 बार दोहराया जा सकता है। हाथ से परागण के साथ-साथ प्राकृतिक परागण को बढ़ावा देना भी उतना ही आवश्यक है। इसके लिए बागों में प्रति हेक्टेयर 5 से 8 मधुमक्खी बक्से स्थापित करने चाहिए। साथ ही इस अवधि में कीटनाशकों का अनावश्यक प्रयोग नहीं करना चाहिए,ताकि परागण करने वाले कीटों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। विशेषज्ञों का मानना है कि हाथ से परागण अपनाने से फल बनने की दर में 20 से 40 प्रतिशत तक वृद्धि संभव है। इससे न केवल उत्पादन बढ़ता है,बल्कि फल का आकार,रंग और गुणवत्ता भी बेहतर होती है,जिससे किसानों को बाजार में अच्छा मूल्य मिलता है। किसानों के लिए सरल और लाभकारी उपाय-जिन बागों में परागणकर्ता किस्मों की कमी है या मौसम अनुकूल नहीं है,वहां हाथ से परागण एक सरल,सस्ता और अत्यंत प्रभावी उपाय साबित हो सकता है। यह तकनीक न केवल उत्पादन बढ़ाती है,बल्कि किसानों की आय में भी सीधा इजाफा करती है। यदि किसान इस महत्वपूर्ण समय में वैज्ञानिक विधियों को अपनाते हैं,तो सेब उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं और अपनी मेहनत का बेहतर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।