
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के संस्थान नवाचार परिषद (आईआईसी) प्रकोष्ठ द्वारा मंगलवार को स्टार्ट-अप के लिए बौद्धिक संपदा अधिकार का संरक्षण एवं बौद्धिक संपदा प्रबंधन विषय पर एक प्रभावशाली ऑनलाइन कार्यशाला का सफल आयोजन किया गया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों,शोधार्थियों,शिक्षाविदों एवं नवाचार से जुड़े युवाओं को बौद्धिक संपदा अधिकारों की उपयोगिता,पेटेंट संरक्षण की प्रक्रिया तथा नवाचार आधारित उद्यमिता एवं स्टार्ट-अप के लिए प्रभावी बौद्धिक संपदा प्रबंधन के प्रति जागरूक करना रहा। कार्यक्रम का शुभारंभ आईआईसी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष प्रो.गोविंदन के आत्मीय स्वागत संबोधन से हुआ। उन्होंने कहा कि वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मक दौर में नवाचार और अनुसंधान को सुरक्षित रखने के लिए बौद्धिक संपदा अधिकार अत्यंत आवश्यक हो गए हैं। उन्होंने विश्वविद्यालयों एवं शैक्षणिक संस्थानों में शोध और नवाचार संस्कृति को मजबूत करने पर विशेष बल दिया। इसके पश्चात डॉ.शिवानी उनियाल ने प्रारंभिक वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि आज के समय में युवा शोधकर्ताओं और नवाचारकर्ताओं के लिए बौद्धिक संपदा अधिकारों की जानकारी अनिवार्य बन चुकी है। उन्होंने कहा कि यदि किसी नवाचार को कानूनी संरक्षण नहीं मिलता,तो उसकी मौलिकता और उपयोगिता दोनों प्रभावित हो सकती हैं। कार्यक्रम समन्वयक डॉ.भास्करन ने कार्यशाला के उद्देश्य एवं रूपरेखा को विस्तार से प्रस्तुत करते हुए बताया कि विश्वविद्यालय नवाचार एवं उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयासरत है। उन्होंने कार्यशाला में उपस्थित प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों में डॉ.पवन बिजल्वाण,सहायक प्रोफेसर एवं पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक,टाटा स्टील तथा डॉ.राज कुमार मिश्रा,प्रधान वैज्ञानिक,भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान कानपुर का स्वागत किया। विषय विशेषज्ञों का औपचारिक परिचय डॉ.पिया चौधरी द्वारा कराया गया। तकनीकी सत्र के दौरान डॉ.पवन बिजल्वाण ने पेटेंट और औद्योगिक विकास में उनकी भूमिका पर अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं व्यावहारिक व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने पेटेंट प्रारूपण,पेटेंट आवेदन की प्रक्रिया,अनुसंधान आधारित नवाचारों की सुरक्षा तथा नए विचारों को कानूनी संरक्षण प्रदान करने की रणनीतियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि किसी भी शोध अथवा नवाचार को वैश्विक पहचान दिलाने में पेटेंट की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उनका व्याख्यान शोधार्थियों एवं नवाचारकर्ताओं के लिए अत्यंत प्रेरणादायी एवं उपयोगी सिद्ध हुआ। द्वितीय विषय विशेषज्ञ डॉ.राज कुमार मिश्रा ने कृषि क्षेत्र में बौद्धिक संपदा अधिकारों की आवश्यकता और महत्व पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कृषि नवाचार,अनुसंधान उन्नयन,पादप संरक्षण,तकनीकी हस्तांतरण तथा वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देने में बौद्धिक संपदा अधिकारों की उपयोगिता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि कृषि विज्ञान के क्षेत्र में नए अनुसंधान और तकनीकों को सुरक्षित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। कार्यशाला में विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों के संकाय सदस्यों,शोधार्थियों तथा स्नातक एवं स्नातकोत्तर विद्यार्थियों सहित 60 से अधिक प्रतिभागियों ने सक्रिय सहभागिता की। संवादात्मक चर्चा,प्रश्नोत्तर सत्र एवं विशेषज्ञों के अनुभवों ने प्रतिभागियों के ज्ञानवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यक्रम के अंत में डॉ.सुभ्रदी मिस्त्री ने औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी वक्ताओं,आयोजकों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। समापन अवसर पर डॉ.शिवानी उनियाल ने कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएं युवाओं को नवाचार,अनुसंधान और उद्यमिता की दिशा में आगे बढ़ने के लिए नई प्रेरणा प्रदान करती हैं। इसी के साथ कार्यशाला का सफल समापन हुआ।