बद्रीनाथ धाम में भारतीय ज्ञान परंपरा का महाकुंभ-सनातन संस्कृति ही विश्वशांति का आधार

हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी बद्रीनाथ/देवप्रयाग/श्रीनगर गढ़वाल। विश्व प्रसिद्ध श्री बद्रीनाथ धाम की पावन धरा पर भारतीय ज्ञान परंपरा,वैदिक संस्कृति और सनातन मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में देश-विदेश

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हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी

बद्रीनाथ/देवप्रयाग/श्रीनगर गढ़वाल। विश्व प्रसिद्ध श्री बद्रीनाथ धाम की पावन धरा पर भारतीय ज्ञान परंपरा,वैदिक संस्कृति और सनातन मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में देश-विदेश से पहुंचे विद्वानों ने भारतीय संस्कृति की वैश्विक महत्ता पर गंभीर मंथन किया। सम्मेलन में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा ही वह आधार है,जिसने भारत को विश्वगुरु के रूप में स्थापित किया और आज भी संपूर्ण विश्व भारतीय दर्शन,योग,अध्यात्म और वैदिक विज्ञान की ओर आकर्षित हो रहा है। तीन दिवसीय इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर,सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय,उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय,देवभूमि चारधाम होटल एसोसिएशन,बदरीनाथ होटल एंड लॉन्ज एसोसिएशन तथा अग्निमंदिरम के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है। दीप प्रज्वलन एवं वैदिक मंत्रोच्चार के साथ आरंभ हुए कार्यक्रम में मुख्य अतिथि योगी बालकदास महाराज ने कहा कि भारतीय वैदिक ज्ञान आज विश्वभर में विभिन्न स्वरूपों में जीवित और प्रभावी है। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन विद्याएं विज्ञान की कसौटी पर पूरी तरह खरी उतरती हैं और यही कारण है कि पूरी दुनिया भारतीय ज्ञान परंपरा की ओर आकर्षित हो रही है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी शासनकाल में भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा को कमजोर करने के अनेक प्रयास किए गए,लेकिन हजारों वर्षों की यह विरासत आज भी अक्षुण्ण बनी हुई है। उन्होंने कहा कि हर भारतीय को अपनी संस्कृति,सभ्यता और वैदिक परंपरा पर गर्व होना चाहिए तथा इसे आत्मसात करने की आवश्यकता है। कार्यक्रम में सारस्वत अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए प्रो.पीवीबी सुब्रह्मण्यम ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं है,बल्कि यह प्रत्येक भारतीय के हृदय में जीवंत रूप से विद्यमान है। उन्होंने कहा कि समय-समय पर विश्व के विभिन्न संकटों से मुक्ति दिलाने में भारतीय दर्शन और जीवन पद्धति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा मनुष्य के इहलौकिक और पारलौकिक जीवन दोनों को संतुलित एवं सुदृढ़ बनाती है। नई शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान प्रणाली को विशेष महत्व दिए जाने को उन्होंने सकारात्मक कदम बताते हुए कहा कि आने वाले समय में इसका व्यापक प्रभाव दिखाई देगा। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे भारतीय संस्कृति और परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाएं। सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे प्रो.रमाकांत पांडेय ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा हमें मानवता,विश्वबंधुत्व और सहिष्णुता का मार्ग दिखाती है। उन्होंने कहा कि यह परंपरा हमें अंधकार से प्रकाश और असत्य से सत्य की ओर ले जाने वाली शक्ति है। उन्होंने कहा कि विदेशी आक्रांताओं ने तक्षशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों को नष्ट करने का प्रयास किया,ग्रंथालयों को जलाया गया,लेकिन भारतीय ज्ञान का विशाल भंडार फिर भी सुरक्षित रहा। यह हमारी संस्कृति की जीवंतता और शक्ति का प्रमाण है। श्री बदरीनाथ धाम के धर्माधिकारी विशंभर सेमवाल ने इस आयोजन को सनातन संस्कृति के संरक्षण और प्रचार-प्रसार की दिशा में मील का पत्थर बताया। वहीं केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व निदेशक प्रो.बनमाली विश्वाल ने कहा कि आज विश्व में उपलब्ध अधिकांश ज्ञान की मूल प्रेरणा भारतीय ज्ञान परंपरा ही है। कार्यक्रम के दौरान शोध सामग्री का विमोचन भी किया गया तथा वक्ताओं ने जनजातीय कर्ण परंपरा,लोकसंस्कृति और भारतीय वैदिक धरोहर के संरक्षण पर विशेष जोर दिया। इस अवसर पर राजेश मेहता,प्रो.शैलेश तिवारी,डॉ.जनार्दन प्रसाद नौटियाल,डॉ.दिनेशचंद्र पांडेय,कृष्णकांत पंत,रजतगौतम छेत्री सहित अनेक विद्वान,शोधार्थी एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ.प्रदीप सेमवाल ने किया। सम्मेलन का समापन 15 मई को होगा।

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