
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। जब जिंदगी ने दुनिया में आने से पहले ही एक नन्हे शिशु के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी,तब चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ की समर्पित मेहनत ने उस चुनौती को उम्मीद में बदल दिया। महज 25 सप्ताह में जन्मा 700 ग्राम का नवजात,जिसके लिए जिंदगी की पहली सांस लेना ही किसी जंग से कम नहीं था,आज स्वस्थ होकर अपनी मां की गोद में घर लौट चुका है। बेस चिकित्सालय श्रीनगर के नीक्कू (Neonatal Intensive Care) वार्ड की चिकित्सकीय टीम ने करीब दो महीने तक लगातार निगरानी,उपचार और देखभाल कर इस नन्ही जिंदगी को बचाने में सफलता हासिल की। सामान्य गर्भावस्था लगभग 39 से 40 सप्ताह की होती है,लेकिन इससे काफी पहले जन्म लेने वाले नवजातों में फेफड़े,मस्तिष्क सहित शरीर के कई अंग पूरी तरह विकसित नहीं होते। ऐसे बच्चों में सांस लेने में कठिनाई,संक्रमण और कम वजन जैसी गंभीर चुनौतियां रहती हैं। यही कारण है कि 25 से 30 सप्ताह में जन्मे नवजातों का उपचार चिकित्सा जगत में बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है। इन परिस्थितियों के बीच बेस अस्पताल श्रीनगर का बाल रोग विभाग और नीक्कू वार्ड पर्वतीय क्षेत्र के लिए बड़ी चिकित्सा उम्मीद बनकर उभर रहा है। रुद्रप्रयाग जनपद के पुनाड़ क्षेत्र निवासी अल्पना नौटियाल के लिए 16 जून का दिन जिंदगी भर याद रहने वाला बन गया। उनकी डिलीवरी महज 25 सप्ताह में हो गई और नवजात का वजन केवल 700 ग्राम था। समय से लगभग 14-15 सप्ताह पहले जन्म लेने के कारण बच्चे की हालत बेहद नाजुक थी। उसे बेहतर उपचार के लिए बेस चिकित्सालय श्रीनगर के नीक्कू वार्ड में भर्ती कराया गया। चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ की लगातार निगरानी,आवश्यक चिकित्सकीय उपचार,वेंटिलेटर सपोर्ट,पोषण प्रबंधन और संक्रमण से बचाव के प्रयासों के बीच बच्चे ने धीरे-धीरे जिंदगी की जंग जीतनी शुरू की। करीब दो महीने के उपचार के बाद उसका वजन बढ़कर 1300 ग्राम हो गया और वह मां का दूध पीने लगा। स्थिति स्थिर होने पर चिकित्सकों ने उसे डिस्चार्ज कर दिया। जब मां अल्पना अपने बच्चे को स्वस्थ अवस्था में घर ले जाने लगीं तो उनकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। उन्होंने चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ का आभार जताते हुए कहा कि अस्पताल में उनके बच्चे की जिस तरह अपने बच्चे की तरह देखभाल की गई,उसे परिवार कभी नहीं भूल पाएगा। चिकित्सक दंपती के नवजात को भी मिला बेहतर उपचार दूसरे मामले में रुद्रप्रयाग के पीएचसी बसुकेदार में तैनात चिकित्सक डॉ.कृतिका की डिलीवरी 27 सप्ताह में सीएचसी अगस्त्यमुनि में हुई। समय से पहले जन्म लेने के कारण नवजात की हालत गंभीर थी और उसे बेहतर उपचार के लिए बेस चिकित्सालय श्रीनगर रेफर किया गया। 24 जुलाई से नीक्कू वार्ड में भर्ती नवजात का विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में उपचार किया गया। लगातार देखभाल के बाद बच्चे की हालत में सुधार आया और स्वस्थ होने पर उसे घर भेज दिया गया। डॉ.कृतिका के पति एवं डिप्टी कमांडेंट ऋषभ बिष्ट ने नीक्कू वार्ड की सेवाओं की सराहना करते हुए कहा कि गंभीर स्थिति में नवजात को यहां लगातार बेहतर चिकित्सकीय सेवाएं और निगरानी मिली। उन्होंने चिकित्सकों एवं नर्सिंग स्टाफ की मेहनत के प्रति आभार व्यक्त किया। रुद्रप्रयाग जनपद से आई विनीता का प्री-मैच्योर नवजात भी 20 जुलाई से नीक्कू वार्ड में भर्ती रहा और उपचार के बाद स्वस्थ होकर घर गया। वहीं 30 जुलाई को रुद्रप्रयाग से रेफर होकर आई ललिता ने 28 सप्ताह में जुड़वां बच्चों को जन्म दिया। दोनों नवजात बेहद नाजुक स्थिति में थे। दुर्भाग्यवश एक नवजात ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया,जबकि दूसरे नवजात को नीक्कू वार्ड में उपचार के बाद स्वस्थ अवस्था में डिस्चार्ज किया गया। इन मामलों ने एक बार फिर यह साबित किया है कि अत्यंत कम वजन और समय से पहले जन्मे नवजातों के लिए समय पर उच्च स्तरीय नवजात चिकित्सा सुविधा कितनी महत्वपूर्ण है। नीक्कू ग्रेजुएट बना 700 ग्राम का नन्हा योद्धा अल्पना के बच्चे के स्वस्थ होकर घर लौटने का पल बेस अस्पताल के चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ के लिए भी भावुक कर देने वाला रहा। करीब दो महीने तक नीक्कू वार्ड में उपचार के बाद जब बच्चा घर जाने के लिए तैयार हुआ तो टीम ने उसे प्यार से नीक्कू ग्रेजुएट का खिताब दिया। नवजात को कैप और हुड पहनाकर बधाई दी गई तथा नीक्कू वार्ड में केक काटकर इस उपलब्धि का जश्न मनाया गया। इस आत्मीय पल ने बच्चे के पिता और दादी को भी भावुक कर दिया। परिजनों ने कहा कि चिकित्सकों ने केवल इलाज ही नहीं किया,बल्कि कठिन समय में परिवार का मनोबल भी बनाए रखा और उम्मीद नहीं टूटने दी। नीक्कू वार्ड में उपचार के बाद स्वस्थ होकर घर लौटे कई बच्चों के परिजनों ने चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ के प्रति आभार व्यक्त करते हुए पत्र भी दिए हैं,जिन्हें वार्ड के बोर्ड पर प्रदर्शित किया गया है। बाल रोग विभागाध्यक्ष प्रो.सी.एम.शर्मा ने बताया कि अत्यंत प्री-मैच्योर नवजातों को लंबे समय तक वेंटिलेटर सपोर्ट,विशेष दवाओं,लगातार मॉनिटरिंग,पोषण प्रबंधन और विशेषज्ञ चिकित्सकीय देखभाल की आवश्यकता पड़ सकती है। निजी अस्पतालों में ऐसे मामलों के उपचार पर परिवार को 15 से 20 लाख रुपये तक खर्च उठाना पड़ सकता है। इसके विपरीत बेस चिकित्सालय में पात्र मरीजों को सरकारी व्यवस्था के तहत आवश्यक उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है,जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को बड़ी राहत मिल रही है। उन्होंने कहा कि 25 से 30 सप्ताह में जन्मे नवजातों को बचाना अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है। इनके फेफड़े और अन्य अंग पूरी तरह विकसित नहीं होते तथा संक्रमण का खतरा भी अधिक रहता है। नीक्कू वार्ड की पूरी टीम ने बेहतर चिकित्सकीय प्रबंधन,निरंतर निगरानी और परिजनों के सहयोग से इन नन्ही जिंदगियों को बचाने का हर संभव प्रयास किया। 25 सप्ताह में जन्मे 700 ग्राम के नवजात को स्वस्थ कर घर भेजना पूरी टीम के लिए बेहद संतोष का विषय है। बेस अस्पताल के बाल रोग विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो.सी.एम.शर्मा के नेतृत्व में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ.अंकिता गिरी,सीनियर रेजीडेंट डॉ.अजय गोस्वामी सहित पीजी डॉक्टरों और नीक्कू वार्ड के नर्सिंग स्टाफ की महत्वपूर्ण भूमिका रही। पीजी डॉक्टरों में डॉ.महेश,डॉ.धीरज,डॉ.दानिश,डॉ.जाहिद,डॉ.अंजलि एवं डॉ.आशीष के साथ नीक्कू वार्ड की इंचार्ज विजय फोनिया तथा साहिबा,नेहा,सुमन,श्वेता,पंकज,सोमती,मनीष और सानवी सहित नर्सिंग स्टाफ ने नवजातों की निरंतर देखभाल में महत्वपूर्ण योगदान दिया। गायनी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ.दीप्ति शर्मा ने कहा कि समय से पहले प्रसव के जोखिम को कम करने के लिए गर्भवती महिलाओं को नियमित प्रसवपूर्व जांच करानी चाहिए। चिकित्सकीय सलाह के अनुसार अल्ट्रासाउंड एवं आवश्यक जांच कराना,पौष्टिक आहार लेना,पर्याप्त आराम करना और संक्रमण या असामान्य लक्षणों को नजरअंदाज न करना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि पेट में लगातार दर्द,कमर में खिंचाव,पानी आना,रक्तस्राव अथवा नियमित अंतराल पर संकुचन महसूस होने पर तत्काल अस्पताल पहुंचना चाहिए। गर्भावस्था के दौरान बिना चिकित्सकीय सलाह के दवा लेने से भी बचना चाहिए। समय पर जांच और सही चिकित्सकीय सलाह से प्री-मैच्योर डिलीवरी के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। राजकीय मेडिकल कॉलेज श्रीनगर के प्राचार्य डॉ.सीएमएस रावत ने कहा कि प्री-मैच्योर नवजातों को नया जीवन देना बेस अस्पताल की उत्कृष्ट चिकित्सा सेवाओं और चिकित्सकीय टीम की समर्पित मेहनत का परिणाम है। उन्होंने बाल रोग विभाग,नीक्कू वार्ड के चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि संस्थान और प्रत्येक विभाग की प्राथमिकता मरीजों को बेहतर एवं गुणवत्तापूर्ण उपचार उपलब्ध कराना है। बेस अस्पताल का नीक्कू वार्ड अब केवल गंभीर नवजातों के उपचार का केंद्र नहीं रह गया है,बल्कि पहाड़ के उन परिवारों के लिए उम्मीद की मजबूत किरण बन रहा है,जिनके नन्हे बच्चे समय से पहले दुनिया में आकर जिंदगी की कठिन जंग लड़ते हैं। 700 ग्राम के नन्हे योद्धा की यह जीत इस बात की गवाही है कि समय पर उपचार,आधुनिक चिकित्सा सुविधा और चिकित्सकीय टीम की समर्पित मेहनत मिल जाए तो बेहद नाजुक जिंदगी को भी नई सांस दी जा सकती है।