
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। जब आधुनिक विज्ञान भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ता है,तब केवल शिक्षा नहीं,बल्कि राष्ट्र निर्माण की नई दिशा भी तैयार होती है। इसी विचार को साकार करते हुए राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान एनआईटी उत्तराखंड के मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग द्वारा भारतीय ज्ञान प्रणाली एनसीआईकेएस-2026 विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का भव्य एवं सफल आयोजन संपन्न हुआ। सम्मेलन में देशभर के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों,वैज्ञानिकों,शोधकर्ताओं एवं विशेषज्ञों ने भारतीय ज्ञान परंपरा की समकालीन प्रासंगिकता तथा विकसित भारत के निर्माण में उसकी भूमिका पर व्यापक चिंतन-मंथन किया। सम्मेलन का शुभारंभ संस्थान के निदेशक प्रो.करुणेश कुमार शुक्ला की अध्यक्षता में हुआ। मुख्य अतिथि के रूप में डॉ.ऋषि मोहन भटनागर चेयरमैन फ्यूचर इनोवेशन स्टूडियोज एवं वैश्विक प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ उपस्थित रहे,जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो.पीवीबी.सुब्रह्मण्यम निदेशक केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय देवप्रयाग तथा प्रो.महेंद्र बाबू कुशवाह अध्यक्ष व्यवसाय प्रबंधन विभाग हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय ने सम्मेलन की गरिमा बढ़ाई। सम्मेलन संयोजक एवं मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ.मीनाक्षी राणा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं,बल्कि वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करने वाली जीवंत बौद्धिक विरासत है। आयोजन सचिव डॉ.रेणु डंगवाल ने सम्मेलन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली सतत विकास,नैतिक नेतृत्व,पर्यावरण संरक्षण,शिक्षा,स्वास्थ्य,साहित्य,संस्कृति और विज्ञान जैसे अनेक क्षेत्रों में आज भी समान रूप से उपयोगी और प्रासंगिक है। अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो.करुणेश कुमार शुक्ला ने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली विज्ञान,प्रौद्योगिकी,दर्शन,संस्कृति और नैतिक मूल्यों का समन्वित स्वरूप प्रस्तुत करती है। उन्होंने इस ज्ञान परंपरा को आधुनिक शोध एवं नवाचार से जोड़ने तथा युवाओं को इसके प्रति जागरूक करने पर बल दिया। मुख्य अतिथि डॉ.ऋषि मोहन भटनागर ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता,उभरती प्रौद्योगिकियों और तीव्र वैश्विक परिवर्तनों के दौर में भारतीय ज्ञान प्रणाली की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए युवा शोधकर्ताओं से भारतीय बौद्धिक परंपरा से प्रेरणा लेकर आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक के क्षेत्र में नवीन अनुसंधान करने का आह्वान किया। सम्मेलन में यूकॉस्ट,बुंदेलखंड विश्वविद्यालय,एनआईटी कुरुक्षेत्र,एमएनआईटी जयपुर,सीवीएम विश्वविद्यालय गुजरात तथा देश के अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों के विशेषज्ञों ने योग,आयुर्विज्ञान,मनोविज्ञान,साहित्य,भाषाविज्ञान,भारतीय सांस्कृतिक परंपराएं,गणित,खगोल विज्ञान,कृत्रिम बुद्धिमत्ता,संगणकीय विज्ञान,पर्यावरण,जलवायु परिवर्तन,वास्तुकला,सुशासन,नेतृत्व,सतत विकास और डिजिटल स्वास्थ्य जैसे विषयों पर व्याख्यान प्रस्तुत किए। दो दिवसीय सम्मेलन में हाइब्रिड माध्यम से 11 तकनीकी सत्रों का आयोजन किया गया। देशभर से प्राप्त 100 से अधिक शोध-पत्रों में से 70 शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए। शोधार्थियों और विशेषज्ञों ने भारतीय ज्ञान प्रणाली को समकालीन अनुसंधान,नवाचार और वैश्विक विमर्श से जोड़ने की दिशा में सार्थक विचार रखे। सम्मेलन में शिक्षाविदों,वैज्ञानिकों,साहित्यकारों और शोधकर्ताओं की सक्रिय सहभागिता ने इसे राष्ट्रीय स्तर का महत्वपूर्ण अकादमिक मंच बना दिया। समापन अवसर पर संस्थान के निदेशक प्रो.करुणेश कुमार शुक्ला ने आयोजन समिति को सफल आयोजन के लिए बधाई देते हुए कहा कि ऐसे सम्मेलन भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाने के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। अनुसंधान एवं परामर्श अधिष्ठाता डॉ.धर्मेंद्र त्रिपाठी तथा कुलसचिव डॉ.हरिमोल आजाद ने भी आयोजन समिति के प्रयासों की सराहना की। कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन और राष्ट्रगान के साथ हुआ। सम्मेलन ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि भारतीय ज्ञान प्रणाली केवल इतिहास का गौरव नहीं,बल्कि विकसित भारत-2047 के निर्माण की एक सशक्त आधारशिला है।