हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं,बल्कि समाज को दिशा देने वाली वह चेतना है जो समय के हर दौर में मनुष्य को उसके कर्तव्यों,मूल्यों और संवेदनाओं का बोध कराती है। कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर आयोजित विचार संगोष्ठी में यही भाव प्रमुखता से उभरकर सामने आया। वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि प्रेमचंद का साहित्य आज भी सामाजिक चेतना,मानवीय मूल्यों और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना का सबसे सशक्त आधार है। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग तथा अजीम प्रेमजी फाउंडेशन,श्रीनगर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस संगोष्ठी में प्रेमचंद के जीवन,साहित्य,विचारधारा तथा उनकी समकालीन प्रासंगिकता पर विस्तृत एवं गंभीर विमर्श किया गया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शिक्षकों,शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता करते हुए प्रेमचंद की साहित्यिक विरासत को वर्तमान समय के संदर्भ में समझने का प्रयास किया। कार्यक्रम की मुख्य वक्ता एवं अंग्रेजी विभागाध्यक्ष प्रो.मोनिका गुप्ता ने कहा कि प्रेमचंद केवल हिंदी साहित्य के महान कथाकार नहीं,बल्कि भारतीय समाज की आत्मा के सशक्त व्याख्याकार हैं। उनका साहित्य सामाजिक विषमताओं,आर्थिक असमानताओं,नैतिक संघर्षों और मानवीय संवेदनाओं का ऐसा जीवंत दस्तावेज है,जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद के पात्र समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की पीड़ा,संघर्ष और आत्मसम्मान को स्वर देते हैं। विश्वविद्यालय के मुख्य नियंता प्रो.दीपक कुमार ने कहा कि प्रेमचंद ने साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का प्रभावी औजार बनाया। उनका लेखन समानता,न्याय,मानवीय गरिमा और सामाजिक उत्तरदायित्व की स्थापना का संदेश देता है। आज जब समाज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है,तब प्रेमचंद के विचार नई पीढ़ी को सही दिशा प्रदान करते हैं। हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभागाध्यक्ष प्रो.मंजुला राणा ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य भारतीय जीवन-दर्शन,लोकसंस्कृति और सामाजिक यथार्थ का प्रामाणिक दर्पण है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे प्रेमचंद की रचनाओं का गंभीर अध्ययन करें,क्योंकि उनके साहित्य में केवल कथा नहीं,बल्कि जीवन के नैतिक मूल्य,सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय संवेदनाओं का गहन संदेश निहित है। संगोष्ठी के दौरान शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने प्रेमचंद के जीवन और साहित्य पर अपने विचार प्रस्तुत किए। इस अवसर पर प्रेमचंद के साहित्य पर आधारित प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता तथा उनके विचारों पर गहन वैचारिक मंथन भी आयोजित किया गया,जिसमें प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लेकर उनकी रचनाधर्मिता और सामाजिक दृष्टि को नई पीढ़ी के संदर्भ में समझने का प्रयास किया। अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के प्रतिनिधि संजय एवं मीमांसा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रेमचंद का साहित्य शिक्षा,सामाजिक न्याय और मानवीय मूल्यों की स्थापना का सशक्त माध्यम है। उनकी वैचारिक विरासत आज भी समाज को संवेदनशील,समावेशी और न्यायपूर्ण बनाने की प्रेरणा देती है। कार्यक्रम के समापन अवसर पर हिंदी विभाग के सहायक आचार्य डॉ.कपिल पंवार ने सभी अतिथियों,वक्ताओं एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि तकनीकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के तेजी से विकसित होते युग में भी साहित्य की उपयोगिता और प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। बल्कि ऐसे समय में प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों की मानवीय दृष्टि समाज को संवेदनशील,विवेकशील और नैतिक बनाए रखने में पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। कार्यक्रम का प्रभावी संचालन हिंदी विभाग की शोधार्थी पीअंजलि ने किया। संगोष्ठी में हिंदी,अंग्रेजी एवं संस्कृत विभाग के शोधार्थियों सहित विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के छात्र-छात्राओं की उल्लेखनीय सहभागिता रही। पूरे आयोजन ने यह संदेश दिया कि प्रेमचंद का साहित्य केवल इतिहास का हिस्सा नहीं,बल्कि वर्तमान और भविष्य के समाज को मानवीय मूल्यों से जोड़ने वाली एक जीवंत वैचारिक धरोहर है।