
हिमालय टाइम्स गबर सिंह भण्डारी
श्रीनगर गढ़वाल। कुछ व्यक्तित्व समय के साथ केवल इतिहास का हिस्सा नहीं बनते,बल्कि स्वयं इतिहास की जीवित पहचान बन जाते हैं। उनका जीवन,उनके संघर्ष,उनके विचार और समाज के प्रति उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाता है। श्रीनगर के पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष,वरिष्ठ समाजसेवी एवं जन-आंदोलनों के सक्रिय हस्ताक्षर कृष्णानंद मैठाणी ऐसे ही व्यक्तित्व हैं,जिनकी संघर्षपूर्ण जीवन यात्रा अब एक ऐतिहासिक पुस्तक के रूप में समाज के सामने आने जा रही है। संघर्ष का इतिहास-अपनी जीवन यात्रा एवं जन संघर्षों का इतिहास शीर्षक से उनकी स्वलिखित पुस्तक शीघ्र ही प्रकाशित होकर पाठकों,शुभचिंतकों,शोधार्थियों,इतिहासकारों,विद्यार्थियों तथा उत्तराखंड के इतिहास में रुचि रखने वाले सभी लोगों तक पहुंचेगी। यह पुस्तक केवल एक आत्मकथा नहीं,बल्कि श्रीनगर गढ़वाल,उत्तराखंड और स्वतंत्र भारत के सामाजिक,राजनीतिक एवं सांस्कृतिक विकास की एक सशक्त ऐतिहासिक गाथा है। इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें घटनाओं का वर्णन किसी दर्शक की दृष्टि से नहीं,बल्कि उन संघर्षों के प्रत्यक्ष सहभागी की कलम से किया गया है। यही कारण है कि पुस्तक का प्रत्येक अध्याय पाठकों को उस दौर की परिस्थितियों,चुनौतियों,जनभावनाओं और संघर्षों के बीच ले जाता है। इसमें केवल घटनाओं का क्रम नहीं,बल्कि उस समय की सामाजिक चेतना,जन-आकांक्षाओं और परिवर्तन की यात्रा भी पूरी संवेदनशीलता के साथ उभरकर सामने आती है। कृष्णानंद मैठाणी ने अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में जनहित,सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय विकास से जुड़े अनेक आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। उनके जीवन का प्रत्येक पड़ाव समाज के प्रति समर्पण,जनसेवा और लोककल्याण की भावना से प्रेरित रहा। यही अनुभव इस पुस्तक को विशेष और विश्वसनीय बनाते हैं। पुस्तक में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय की स्थापना के ऐतिहासिक संघर्ष,उत्तराखंड राज्य आंदोलन,वर्ष 1952 में श्रीनगर के श्रीयंत्र टापू पर आयोजित ऐतिहासिक महायज्ञ,कंसमर्दनी मंदिर से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंग,आरक्षण विरोधी आंदोलन,उत्तराखंड क्रांति दल की स्थापना और उसके प्रारंभिक संघर्ष,श्रीनगर की पीएसएल योजनाओं तथा उस समय के राजनीतिक एवं सामाजिक परिवेश का अत्यंत रोचक और तथ्यपरक वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रामनरेश यादव तथा पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा से जुड़े अनेक संस्मरण भी पुस्तक को ऐतिहासिक महत्व प्रदान करते हैं। वहीं वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान पहाड़ों में व्याप्त राष्ट्रीय चेतना,सामाजिक परिस्थितियों और जनभावनाओं का मार्मिक चित्रण पाठकों को उस दौर की वास्तविकता से रूबरू कराता है। यह कृति केवल अतीत की घटनाओं का संकलन नहीं,बल्कि उन संघर्षों की जीवंत अभिव्यक्ति है जिन्होंने उत्तराखंड की सामाजिक और राजनीतिक चेतना को नई दिशा दी। पुस्तक में अनेक ऐसे प्रसंग और संस्मरण शामिल हैं जो आज तक सार्वजनिक रूप से बहुत कम सामने आए हैं। यही कारण है कि यह पुस्तक शोधार्थियों,इतिहासकारों और पत्रकारों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ के रूप में भी स्थापित हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि संघर्ष का इतिहास आने वाले समय में उत्तराखंड के जनआंदोलनों,सामाजिक परिवर्तन और लोकतांत्रिक विकास को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज सिद्ध होगी। इसमें दर्ज तथ्य,संस्मरण और अनुभव नई पीढ़ी को अपने इतिहास,संस्कृति और संघर्षों से जोड़ने का कार्य करेंगे।आज जब इतिहास के अनेक महत्वपूर्ण अध्याय समय की धूल में धुंधले पड़ते जा रहे हैं,ऐसे समय में यह कृति उन अमूल्य स्मृतियों और संघर्षों को शब्दों के माध्यम से सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण प्रयास है। यह पुस्तक पाठकों को केवल जानकारी ही नहीं देगी,बल्कि उन्हें प्रेरित भी करेगी कि समाज और राष्ट्र के निर्माण में जनभागीदारी,संघर्ष,त्याग और लोकसेवा का कितना महत्वपूर्ण स्थान है। जब इतिहास स्वयं उसके साक्षियों की कलम से लिखा जाता है,तब वह केवल साहित्य नहीं रहता,बल्कि समय का प्रमाण बन जाता है। संघर्ष का इतिहास ऐसी ही एक ऐतिहासिक कृति है,जो कृष्णानंद मैठाणी के जीवन-संघर्षों के साथ-साथ उत्तराखंड की जनचेतना,लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक परिवर्तन की अमूल्य विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएगी। निस्संदेह यह पुस्तक केवल एक आत्मकथा नहीं,बल्कि उत्तराखंड के जनसंघर्षों,सामाजिक जागरण,लोकतांत्रिक चेतना और लोकजीवन की प्रेरक महागाथा है। यह कृति वर्तमान को अतीत से जोड़ते हुए भविष्य के लिए एक ऐसी अमूल्य धरोहर सिद्ध होगी,जिसे इतिहास प्रेमी,शोधार्थी,विद्यार्थी और समाज का प्रत्येक जागरूक नागरिक लंबे समय तक स्मरण रखेगा।